📉 नतीजों पर एक गहरी नजर
Signatureglobal (India) Limited ने 31 दिसंबर, 2025 को समाप्त तीसरी तिमाही और नौ महीनों के लिए अपने अन-ऑडिटेड वित्तीय नतीजे जारी किए हैं, और ये नतीजे कंपनी के लिए चिंता का विषय हैं।
तिमाही के आंकड़े (Q3 FY26):
- कंसोलिडेटेड रेवेन्यू 65.65% की भारी गिरावट के साथ ₹2,844.38 मिलियन रहा। पिछले साल इसी तिमाही में यह ₹8,280.85 मिलियन था।
- कंसोलिडेटेड नेट लॉस (Net Loss) ₹453.38 मिलियन रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी ने ₹291.35 मिलियन का मुनाफा (Profit) कमाया था।
- कंसोलिडेटेड ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margin) फिसलकर -22.23% पर आ गया, जो कि नेगेटिव है।
- स्टैंडअलोन रेवेन्यू में भी 54.55% की गिरावट आई और यह ₹2,992.24 मिलियन रहा।
- स्टैंडअलोन नेट लॉस ₹134.82 मिलियन रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में ₹277.73 मिलियन का मुनाफा था।
- स्टैंडअलोन ऑपरेटिंग मार्जिन भी गिरकर -2.36% पर नेगेटिव हो गया।
नौ महीने के आंकड़े (9M FY26):
- कंसोलिडेटेड रेवेन्यू 24.72% घटकर ₹14,885.99 मिलियन रहा।
- कंसोलिडेटेड नेट लॉस ₹577.64 मिलियन रहा।
- स्टैंडअलोन रेवेन्यू 30.74% घटकर ₹9,234.38 मिलियन रहा।
- स्टैंडअलोन नेट लॉस ₹268.75 मिलियन रहा।
कंपनी ने अक्टूबर 2025 में IFC को जारी किए गए ₹8,750 मिलियन के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (Non-Convertible Debentures) का पूरा उपयोग कर लिया है।
😟 कर्ज चुकाने की क्षमता पर बड़े सवाल
सबसे चिंताजनक बात कंपनी की कर्ज चुकाने की क्षमता को लेकर है। कंसोलिडेटेड लेवल पर डेट-इक्विटी रेशियो (Debt/Equity Ratio) 4.53 है, और स्टैंडअलोन लेवल पर यह 3.41 है।
इसके अलावा, कंसोलिडेटेड डेट सर्विस कवरेज रेशियो (DSCR) गिरकर सिर्फ 0.05x और कंसोलिडेटेड इंटरेस्ट सर्विस कवरेज रेशियो (ISCR) -2.07x पर आ गया है। स्टैंडअलोन ISCR भी 0.83x के निचले स्तर पर है। ये आंकड़े बताते हैं कि कंपनी पर अपने मौजूदा कर्ज और ब्याज की देनदारियों को चुकाने का भारी दबाव है, और उसकी क्षमता बेहद कमजोर हो गई है।
🚩 आगे का रास्ता और जोखिम
Signatureglobal के सामने सबसे बड़ा जोखिम उसकी लिक्विडिटी (Liquidity) और कर्ज चुकाने की क्षमता है। बेहद कम और नेगेटिव कवरेज रेशियो वित्तीय स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। निवेशकों की नजर अब मैनेजमेंट की उन रणनीतियों पर रहेगी जो कंपनी के परफॉरमेंस को बेहतर बना सके, पॉजिटिव कैश फ्लो जेनरेट कर सके और कर्ज के बोझ को कम कर सके। ऐसा न होने पर कंपनी और भी बड़ी वित्तीय मुश्किलों में फंस सकती है।