सीनियर लिविंग सेक्टर को अब एक अलग रियल एस्टेट कैटेगरी के रूप में पहचान दिलाने के लिए लॉबिंग तेज हो गई है। साल 2050 तक भारत में बुजुर्गों की आबादी **34.7 करोड़** तक पहुंचने का अनुमान है, जिसे देखते हुए DLF और Ashiana Housing जैसी कंपनियां अब बुनियादी निर्माण से हटकर सर्विस-ओरिएंटेड इकोसिस्टम पर फोकस कर रही हैं।
इंडस्ट्री के जानकारों और डेवलपर्स की मांग है कि सीनियर लिविंग को 'रेजिडेंशियल' की मौजूदा श्रेणी से निकालकर एक अलग एसेट क्लास का दर्जा दिया जाए। विशेषज्ञों का तर्क है कि वर्तमान वर्गीकरण बुजुर्गों के लिए जरूरी हेल्थकेयर, वेलनेस और विशेष सेवाओं की जरूरतों को पूरा नहीं करता। इस नई श्रेणी से डेवलपर्स को न केवल टारगेटेड फाइनेंशियल इंसेंटिव मिलेंगे, बल्कि लैंड-यूज से जुड़े नियम भी आसान होंगे।
बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव
सीनियर लिविंग का बिजनेस अब सिर्फ घर बेचने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अब एक 'ऑपरेटिंग मॉडल' में बदल रहा है। पारंपरिक रियल एस्टेट में प्रोजेक्ट हैंडओवर करते ही काम खत्म हो जाता है, लेकिन यहां डेवलपर्स को लंबे समय तक हेल्थकेयर, कम्युनिटी एंगेजमेंट और वेलनेस सर्विसेज जैसी सुविधाएं देनी पड़ती हैं।
प्रमुख खिलाड़ियों की एंट्री
दिग्गज डेवलपर्स इस बदलते ट्रेंड को भुनाने में जुट गए हैं। DLF ने गुरुग्राम के सेक्टर 63 में अपना लक्जरी सीनियर लिविंग प्रोजेक्ट लॉन्च किया है, जिसकी सेल्स पोटेंशियल लगभग ₹2,000 करोड़ आंकी गई है। इसके अलावा, Ashiana Housing और Stonecraft Group जैसे खिलाड़ी भी अब 'एक्टिव एजिंग' के कॉन्सेप्ट पर आधारित प्रोजेक्ट्स पर जोर दे रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या हैं जोखिम?
निवेशकों को यह समझना होगा कि ये प्रोजेक्ट्स सामान्य हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की तुलना में अधिक जटिल होते हैं। इनमें 'जेस्टेशन पीरियड' (पूरा होने का समय) लंबा होता है और ऑपरेशनल खर्च भी ज्यादा होते हैं। हालांकि, इनमें सर्विस फीस के जरिए मिलने वाली रिकरिंग इनकम भविष्य में कंपनियों के लिए मुनाफे का एक स्थायी जरिया बन सकती है। डेवलपर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती हेल्थकेयर और सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर का मैनेजमेंट बनाए रखना है।
