कोर्ट ने RERA पर उठाए कड़े सवाल\n\n"क्या इस संस्था को खत्म कर देना ही बेहतर होगा?" - सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) Act (RERA) के कामकाज पर कुछ ऐसी तीखी टिप्पणी की है। यह टिप्पणी तब आई जब कोर्ट एक मामले की सुनवाई कर रहा था, जहां RERA के आदेशों का पालन बिल्डरों द्वारा ठीक से नहीं हो रहा था, खासकर खरीदारों को रिफंड या पजेशन देने के मामलों में। कोर्ट ने चिंता जताई कि अगर RERA डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों की मदद करने का ही जरिया बन गया है, तो इसे जारी रखने का क्या मतलब है।\n\nRERA की असलियत और उम्मीदें\nRERA को 2016 में रियल एस्टेट सेक्टर में ट्रांसपेरेंसी, जवाबदेही और खरीदारों को मजबूत सुरक्षा देने के इरादे से लाया गया था। इससे पहले, "24 से 48 महीनों" तक प्रोजेक्ट्स में देरी आम बात थी, जिससे हजारों करोड़ रुपये फंसे रहते थे। RERA ने प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन, खरीदारों के पैसों को एस्क्रो अकाउंट में रखने ("70%" तक), और अप्रूवल्स की जानकारी देना जैसे कई स्ट्रक्चरल बदलाव लाए। देश भर में "1.15 लाख" से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से लगभग "65-70%" का निपटारा हुआ। RERA के आने के बाद भारत की ग्लोबल रियल एस्टेट ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स में रैंकिंग 2014 में "41वें" स्थान से सुधरकर 2022 में "34वें" स्थान पर आ गई। 2025 तक यह इंडस्ट्री करीब "$290 बिलियन" की होने का अनुमान है और 2026 तक इसमें "$6-7 बिलियन" का इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट पहुंचने की उम्मीद है।\n\nक्यों हो रहा है RERA का बचाव?\nइसके बावजूद, कोर्ट की चिंताएं वाजिब हैं। मुख्य समस्या RERA और इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के बीच ज्यूरिसडिक्शन (अधिकार क्षेत्र) का टकराव है। जब बिल्डर दिवालियापन की कगार पर होते हैं, तो खरीदारों के दावे फाइनेंशियल क्रेडिटर्स के मुकाबले पीछे रह जाते हैं। दोनों कानूनों में अपने-अपने प्रीसिडेंस (प्राथमिकता) के क्लॉज हैं, जिससे खरीदारों को समझ नहीं आता कि किस कानून के तहत जाएं।\n\nइसके अलावा, राज्यों में RERA का लागू होना भी एक जैसा नहीं है। कुछ राज्यों में केस "3-6 महीनों" में निपट जाते हैं, तो कहीं "एक साल" से ज्यादा लग जाता है। कुछ RERA अथॉरिटीज में टेक्निकल और लीगल पदों पर "20-30%" तक की खाली जगह है। कर्नाटक में, K-RERA पर "₹650 करोड़" से ज्यादा की ड्यूज रिकवर करने की चुनौती है, जिसमें रिकवरी रेट कुछ जगहों पर सिर्फ "20%" है। RERA अथॉरिटीज के पास खुद के पुलिस जैसे एग्जीक्यूशन पावर नहीं हैं, वे जिला प्रशासन पर निर्भर हैं।\n\nडेवलपर्स अभी भी कंप्लायंस से बचने या देरी करने के तरीके ढूंढ रहे हैं। "60 दिनों" में विवादों के निपटारे का वादा अक्सर पूरा नहीं होता। हरियाणा में, "200" से ज्यादा नॉन-कंप्लाइंट डेवलपर्स के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हुए हैं।\n\nआगे की राह: खत्म करें या सुधारें?\nइंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि RERA को खत्म करने के बजाय इसे और मजबूत करने की जरूरत है। सुझावों में RERA को टैक्स अथॉरिटीज की तरह ऑटोमैटिक रिकवरी पावर देना, IBC के साथ बेहतर कोऑर्डिनेशन बनाना और डेवलपर्स के फाइनेंशियल स्ट्रेस की ज्यादा डिस्क्लोजर की मांग करना शामिल है। यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि RERA खरीदारों के हितों का असली रक्षक बन सके, ताकि रियल एस्टेट सेक्टर देश की आर्थिक तरक्की में अपना योगदान देता रहे।
SC का RERA पर तीखा सवाल: क्या खत्म हो जाएगा रियल एस्टेट रेगुलेटर?
REAL-ESTATE
Overview
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) Act (RERA) की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे खत्म करने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह एक्ट खरीदारों के बजाय बिल्डरों को फायदा पहुंचा रहा है और खरीदारों की सुरक्षा में नाकाम साबित हो रहा है।
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