एक नई स्टडी के अनुसार, भारत के 6 बड़े शहरों में किरायेदारों का ₹1.26 लाख करोड़ सिक्योरिटी डिपॉजिट के रूप में फंसा हुआ है। यह रकम किरायेदारों की दूसरे कामों और घर खरीदने की क्षमता पर असर डाल रही है। मुंबई और बेंगलुरु में यह रकम सबसे ज्यादा है।
भारत के 6 प्रमुख शहरों में प्रॉपर्टी मालिकों के पास किरायेदारों का कुल ₹1.26 लाख करोड़ सिक्योरिटी डिपॉजिट के तौर पर जमा है। प्रोपटेक फर्म NoBroker की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, यह भारी-भरकम रकम किरायेदारों के लिए बचत या निवेश के लिए उपलब्ध नहीं है, जिसका सीधा असर उनके घर खरीदने की क्षमता पर पड़ रहा है।
किरायेदारों की आवाजाही पर असर
मुंबई और बेंगलुरु में यह फंसा हुआ पैसा सबसे ज्यादा है। मुंबई में ₹41,156 करोड़ और बेंगलुरु में ₹31,628 करोड़ डिपॉजिट के रूप में जमा हैं। बेंगलुरु में तो 75% किरायेदारों का कहना है कि सिक्योरिटी डिपॉजिट की ऊंची रकम के कारण वे अपनी पसंद के घर में शिफ्ट नहीं कर पा रहे हैं। यह समस्या युवाओं, खासकर 18-24 साल के Gen Z के लिए और भी बड़ी है, जो हर 6 से 12 महीने में घर बदलते हैं।
किराए का बोझ और EMI का अंतर
शहरों में किराए का बोझ बढ़ रहा है, लगभग आधे शहरी किरायेदारों की मासिक आय का 30% से ज्यादा हिस्सा सिर्फ किराए पर जा रहा है। मुंबई में यह स्थिति सबसे गंभीर है, जहां 40% किरायेदार अपनी कमाई का 40% से ज्यादा सिर्फ किराया देने में खर्च कर रहे हैं।
इसके साथ ही, 2021 के बाद से किराए पर रहने और घर खरीदने के बीच का वित्तीय अंतर भी बढ़ा है। होम लोन की EMI और किराए की तुलना करने वाला EMI-to-rent रेशियो कई शहरों में बढ़ा है। बेंगलुरु में यह रेशियो 2.07 से बढ़कर 2.38 हो गया, जबकि हैदराबाद में यह 2.21 से 2.47 हो गया। यह बढ़ता अंतर घर खरीदना किराए पर रहने से कम आकर्षक बना रहा है, जिससे लोग किराए के चक्रव्यूह में फंस रहे हैं।
प्रॉपर्टी निवेशकों के लिए रिटर्न और रिस्क
रियल एस्टेट सेक्टर में निवेशकों के लिए, बाजार छोटे घरों की ओर बढ़ रहा है। 1BHK और स्टूडियो अपार्टमेंट बड़े घरों की तुलना में ज्यादा रेंटल यील्ड (Rental Yield) दे रहे हैं। बेंगलुरु और हैदराबाद में यह यील्ड क्रमशः 4.8% और 4.6% है, जबकि 4BHK यूनिट्स की यील्ड 3% से नीचे चली गई है।
हालांकि, किराए की प्रक्रिया में दोनों पक्षों के लिए जोखिम भी हैं। दिल्ली-NCR में 58% किरायेदारों को अपना सिक्योरिटी डिपॉजिट पूरा वापस मिला, लेकिन 30% को कुछ कटौती का सामना करना पड़ा और 12% को बड़े विवादों से गुजरना पड़ा। यह बताता है कि डिपॉजिट वापसी में स्टैंडर्ड तरीकों की कमी है, जिससे मकान मालिक-किरायेदार संबंधों में कड़वाहट आ सकती है और भविष्य में कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
