भारत में रिटेल कंपनियां अब मेट्रो शहरों के बजाय टियर-2 शहरों की ओर रुख कर रही हैं। साल **2020** के बाद से इन शहरों में **59 लाख** स्क्वायर फीट ग्रेड-ए रिटेल स्पेस जोड़ा गया है, जबकि मेट्रो शहरों में यह आंकड़ा केवल **19 लाख** स्क्वायर फीट ही है।
मेट्रो का बढ़ा किराया, टियर-2 बना नया ठिकाना
भारत में रिटेल सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। मेट्रो शहरों में बढ़ते किराए और मार्केट सैचुरेशन (Market Saturation) के कारण कंपनियां अब अपना विस्तार छोटे शहरों यानी टियर-2 मार्केट्स में कर रही हैं। यह सिर्फ एक रणनीति नहीं, बल्कि बिजनेस को मुनाफे में रखने की मजबूरी भी बन गई है।
डेटा में छिपा बड़ा बदलाव
आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2020 से अब तक टियर-2 मार्केट्स में 59 लाख स्क्वायर फीट का ग्रेड-ए रिटेल स्पेस तैयार हुआ है। इसके उलट मेट्रो शहरों में यह विस्तार महज 19 लाख स्क्वायर फीट तक सीमित रहा। हैरानी की बात यह है कि टियर-2 शहरों में कुल शॉपिंग सेंटर स्टॉक का 61% हिस्सा 'ग्रेड-ए' प्रॉपर्टीज का है, जो मेट्रो शहरों के 46% के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसका मतलब है कि कंपनियां छोटे शहरों में भी ग्राहकों को प्रीमियम शॉपिंग एक्सपीरियंस देने पर दांव लगा रही हैं।
क्या है ग्रोथ की असली वजह?
बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, बढ़ती कनेक्टिविटी और छोटे शहरों में बढ़ती डिजिटल पहुंच रिटेलर्स का हौसला बढ़ा रही है। Trent Limited जैसी कंपनियां इन शहरों को अपनी ग्रोथ का अगला बड़ा इंजन मान रही हैं। लेकिन, यहाँ एक बड़ा वित्तीय जोखिम भी है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
टियर-2 शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतों में 2021 से 2026 के बीच करीब 63% का उछाल आया है। अगर रियल एस्टेट की कीमतें स्थानीय लोगों की कमाई की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ती हैं, तो यह कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। निवेशकों को सलाह है कि वे अब इन शहरों में कंपनियों के 'रेवेन्यू प्रति स्क्वायर फीट' (Revenue per sq. ft.) पर नजर रखें, ताकि यह पता चल सके कि क्या वहां की बढ़ती मांग वाकई मुनाफे में बदल रही है।
