निवेशक अक्सर रेजिडेंशियल और कमर्शियल प्रॉपर्टी के बीच असमंजस में रहते हैं। कमर्शियल प्रॉपर्टी में रिटर्न तो ज्यादा दिखता है, लेकिन खाली होने का जोखिम और मेंटेनेंस का खर्चा भी काफी होता है। निवेश से पहले इन फैक्टर्स को समझना बेहद जरूरी है।
मुनाफे के पीछे का गणित
त्योहारी सीजन में प्रॉपर्टी खरीदने का चलन बढ़ जाता है। आमतौर पर कमर्शियल प्रॉपर्टी की रेंटल यील्ड 7% से 8% के बीच दिखाई जाती है, जो कि रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की 2.5% यील्ड के मुकाबले काफी आकर्षक लगती है। लेकिन सिर्फ कागजी नंबर्स पर न जाएं, क्योंकि कमर्शियल प्रॉपर्टी में मेंटेनेंस, मैनेजमेंट फीस और प्रॉपर्टी टैक्स का खर्च काफी अधिक होता है, जो सीधे आपके मुनाफे को कम कर देता है।
रिस्क का फैक्टर
रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी में किरायेदार आसानी से मिल जाते हैं और मैनेजमेंट भी आसान होता है। इसके विपरीत, कमर्शियल एसेट में एक बार किरायेदार के जाने के बाद दोबारा किरायेदार ढूंढने में लंबा समय लग सकता है। अगर आप उधार लेकर निवेश कर रहे हैं, तो लंबे समय तक प्रॉपर्टी खाली रहना आपके लिए बड़ा फाइनेंशियल बोझ बन सकता है।
ब्याज दरों का असर
Reserve Bank of India की रेपो रेट फिलहाल 5.5% पर है, जिससे कर्ज लेना महंगा हो गया है। अगर आप लोन पर प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं, तो रेंटल इनकम इतनी होनी चाहिए कि वह EMI की पूरी जिम्मेदारी उठा सके। सिर्फ प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ने के भरोसे निवेश करना खतरनाक हो सकता है।
सही चुनाव कैसे करें?
निवेश के लिए जगह का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है। कमर्शियल प्रॉपर्टी के लिए हैदराबाद जैसे शहरों के प्रमुख बिजनेस हब के पास की जगहें बेहतर होती हैं। वहीं, रेजिडेंशियल निवेश के लिए ऐसी लोकेशन चुनें जहां बुनियादी सुविधाएं हों और जो एम्प्लॉयमेंट जोन के पास हो। याद रखें, रियल एस्टेट में असली कामयाबी ऊंचे कैपिटल गेन्स के पीछे भागने में नहीं, बल्कि नेट ऑपरेटिंग इनकम (सभी खर्च काटकर बची कमाई) को मजबूत करने में है।
