भारतीय रियल एस्टेट डेवलपर्स और फैमिली ऑफिसेस अब फ्लैट बेचने की पुरानी रणनीति से हटकर होटल प्रॉपर्टीज खरीद रहे हैं। इसका मकसद एक बारगी फायदे की जगह लगातार आमदनी (recurring income) पोर्टफोलियो बनाना है, जो लंबी अवधि में संपत्ति बढ़ाने में मदद करेगा।
क्या बदला है?
भारतीय रियल एस्टेट मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। डेवलपर्स, फैमिली ऑफिसेस और बड़े निवेशक अब हॉस्पिटैलिटी (Hotel) से जुड़ी प्रॉपर्टीज को खरीदने का नया तरीका अपना रहे हैं। पहले जहां ये डेवलपर्स सिर्फ फ्लैट बनाकर बेचते थे, वहीं अब वे होटलों को खरीदकर अपने पोर्टफोलियो का हिस्सा बना रहे हैं। इस स्ट्रेटेजी से होटल सिर्फ सर्विस बिजनेस नहीं रह गए, बल्कि ये प्रॉपर्टीज लगातार आमदनी का जरिया बन रही हैं। यह 'बिल्ड एंड सेल' यानी 'बनाओ और बेच दो' के पारंपरिक मॉडल से बिलकुल अलग है।
लगातार आमदनी की ओर झुकाव
कई सालों तक भारतीय डेवलपर्स का मुख्य बिजनेस मॉडल घर बनाना, उन्हें बेचना और फिर अगले प्रोजेक्ट पर जाना रहा है। इससे एक बार में बड़ा पैसा तो मिल जाता है, लेकिन लंबे समय तक कमाई का जरिया नहीं बनता। होटल जैसी प्रॉपर्टीज को अपने पास रखकर, डेवलपर्स 'एनुइटी इनकम' यानी ऐसी आमदनी हासिल करना चाहते हैं जो समय के साथ लगातार आती रहे। यह तरीका तब फायदेमंद होता है जब रेसिडेंशियल रियल एस्टेट मार्केट धीमा चल रहा हो या डिमांड कम हो। सीधे शब्दों में कहें तो, वे अब होटल को एक ऐसी प्रॉपर्टी की तरह देख रहे हैं जो 24x7 काम करती है, ठीक वैसे ही जैसे कोई लीज पर दिया गया कमर्शियल ऑफिस या शॉपिंग मॉल काम करता है।
ऑपरेशनल हकीकत
लगातार आमदनी का विचार भले ही आकर्षक लगे, लेकिन होटल, वेयरहाउस या ऑफिस जैसी दूसरी प्रॉपर्टीज से बहुत अलग तरीके से काम करते हैं। एक कमर्शियल ऑफिस का लीज रेंट आमतौर पर 'पैसिव' होता है, यानी डेवलपर को बस किराया मिलता है। लेकिन होटल एक एक्टिव सर्विस बिजनेस है। इसमें स्टाफ मैनेजमेंट, खाने की क्वालिटी, मेहमानों का अनुभव और मेंटेनेंस का लगातार ध्यान रखना पड़ता है। अब डेवलपर्स यह समझ रहे हैं कि होटल की वैल्यू सिर्फ बिल्डिंग की नहीं, बल्कि उसके अंदर चल रहे बिजनेस की एफिशिएंसी पर भी निर्भर करती है। अगर सर्विस या मैनेजमेंट की क्वालिटी में थोड़ी भी कमी आई, तो प्रॉपर्टी की वैल्यू तेजी से गिर सकती है।
बिजनेस और फाइनेंशियल रिस्क
इस बदलाव के साथ कुछ खास तरह के रिस्क भी जुड़े हैं, जिन्हें डेवलपर्स को संभालना होगा। दूसरी प्रॉपर्टीज जैसे कि रेसिडेंशियल प्रोजेक्ट्स के विपरीत, होटल इकोनॉमिक साइकिल्स के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। जब इकोनॉमी में मंदी आती है, तो लोग और कंपनियां सबसे पहले ट्रैवलिंग और हॉस्पिटैलिटी पर खर्च कम कर देते हैं। इससे होटलों में ऑक्यूपेंसी (कमरों का भरा होना) तेजी से गिर सकती है। इसके अलावा, होटलों को कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए लगातार अपग्रेड और मेंटेनेंस पर भारी खर्च करना पड़ता है। जो डेवलपर्स प्रॉपर्टी बेचकर आगे बढ़ने के आदी हैं, उन्हें होटल बिजनेस की यह 'ऑपरेटिंग इंटेंसिटी' (लगातार काम करने की जरूरत) चुनौतीपूर्ण लग सकती है। अगर होटल खरीदने या बनाने के लिए कर्ज लिया गया है, तो कंपनी को यह सुनिश्चित करना होगा कि खराब समय में भी ऑपरेशन से होने वाली कमाई ब्याज चुकाने के लिए काफी हो।
इन्वेस्टर्स को क्या देखना चाहिए?
इस सेक्टर पर नजर रखने वाले इन्वेस्टर्स के लिए, अब ट्रैक करने वाले मुख्य मेट्रिक्स बदल गए हैं। उन्हें सिर्फ जमीन का डेटा या फ्लैट बिक्री के आंकड़े नहीं देखने चाहिए। अब होटल पोर्टफोलियो की ऑपरेशनल एफिशिएंसी, जैसे ऑक्यूपेंसी रेट और प्रति उपलब्ध कमरा (Revenue Per Available Room - RevPAR) कितना कमा रहा है, ये देखना महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा, यह भी देखना चाहिए कि डेवलपर खुद होटल चला रहा है या प्रोफेशनल मैनेजमेंट चेन्स को हायर कर रहा है, क्योंकि प्रोफेशनल मैनेजमेंट अक्सर बेहतर कंट्रोल और ब्रांड वैल्यू देता है। डेवलपर्स की 'डेवलपर' सोच से 'एसेट मैनेजर' सोच में बदलने की क्षमता, उनके लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल हेल्थ के लिए क्रिटिकल होगी।
