अगर आपका घर समय पर नहीं मिल रहा है, तो RERA की धारा 18 आपके लिए एक बड़ा कानूनी हथियार है। यह आपको देरी पर ब्याज मांगने या ब्याज के साथ पूरे पैसे रिफंड लेने का हक देती है।
जब कोई रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पजेशन की डेडलाइन पार कर देता है, तो होमबॉयर्स पर होम लोन की ईएमआई (EMI) और किराए का दोहरा बोझ आ जाता है। ऐसे में 'रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट' की धारा 18 खरीदारों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। यह नियम सुनिश्चित करता है कि डेवलपर्स बिना किसी जवाबदेही के काम में देरी नहीं कर सकते। इसके तहत खरीदार के पास दो रास्ते होते हैं: या तो देरी की अवधि के लिए ब्याज मांगें या फिर पूरा पैसा, ब्याज और मुआवजे के साथ वापस लेकर प्रोजेक्ट से बाहर निकल जाएं।
मजबूत कानूनी दावा कैसे करें
RERA ट्रिब्यूनल में केस जीतना काफी हद तक आपकी डॉक्यूमेंटेशन की क्वालिटी पर निर्भर करता है। सेल एग्रीमेंट, अलॉटमेंट लेटर और पेमेंट की रसीदें संभालकर रखें। बिल्डर के साथ हुए ईमेल या लेटर कम्यूनिकेशन, जहां उन्होंने देरी मानी हो या नया टाइमलाइन दिया हो, साक्ष्य के रूप में बहुत काम आते हैं।
स्टेट RERA पोर्टल का उपयोग
कानूनी कदम उठाने से पहले अपने स्टेट के RERA पोर्टल पर प्रोजेक्ट का स्टेटस जरूर चेक करें। यहां आपको रिवाइज्ड कंप्लीशन डेट और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट का स्टेटस पता चल जाएगा। यदि डेवलपर ने देरी की है या पहले से कई शिकायतें दर्ज हैं, तो रिफंड का केस और भी मजबूत हो जाता है।
अन्य विकल्प और रणनीति
हालांकि RERA मुख्य मंच है, लेकिन अगर डेवलपर दिवालिया हो रहा है, तो खरीदार नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) या कंज्यूमर कोर्ट का रुख भी कर सकते हैं। रिफंड का फैसला लेते समय प्रॉपर्टी की मौजूदा मार्केट वैल्यू और डेवलपर की भुगतान क्षमता को जरूर परखें। यदि डेवलपर RERA के आदेश नहीं मानता है, तो अथॉरिटी डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन के जरिए रिकवरी प्रोसीडिंग्स भी शुरू कर सकती है।
