RERA पर केंद्र का कड़ा रुख: क्या सुधरेंगे हालात?
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों के बाद सरकार रियल एस्टेट रेगुलेशन (RERA) के अमल को लेकर गंभीर हो गई है। कोर्ट ने कहा था कि RERA अथॉरिटीज बिल्डरों को फायदा पहुंचाने का काम कर रही हैं और खरीदारों को निराशा हाथ लग रही है। इसी को देखते हुए, केंद्रीय आवास मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने संकेत दिए हैं कि अब राज्य सरकारों के RERA बाइलॉज (bye-laws) को केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी। यह कदम RERA एक्ट के मकसद को हर राज्य में एक जैसा लागू करने और खरीदारों के हितों की रक्षा करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
राज्यों और केंद्र के बीच खींचतान
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटीज (RERA Authorities) पर आई सख्त टिप्पणी ने सरकारी महकमे में हलचल मचा दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि अथॉरिटीज 'सिर्फ डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों की मदद कर रही हैं' और घर खरीदार 'निराश, हताश और हताश' हैं। इस पर केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि एक संसदीय समिति इस बात की वकालत करेगी कि राज्य RERA बाइलॉज की जांच केंद्र करे। यह दिखाता है कि सरकार राज्यों द्वारा RERA एक्ट को कमजोर किए जाने की कोशिशों पर लगाम लगाना चाहती है। RERA एक्ट भले ही केंद्र सरकार ने बनाया हो, लेकिन इसे लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों की है। इसी वजह से देश भर में नियमों के अमल में एकरूपता नहीं है, जो बिल्डर-अनुकूल राज्यों में फायदेमंद साबित हो सकता है।
मार्केट की गहरी समस्याएं और नए समाधान
नियमों को एक जैसा बनाने के अलावा, सरकार अफोर्डेबल हाउसिंग (affordable housing) के लिए फंडिंग और RERA से पहले के अटके हुए प्रोजेक्ट्स (stalled pre-RERA projects) जैसी गहरी समस्याओं से भी जूझ रही है। बैंकों और फाइनेंशियल संस्थानों के लिए अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट में पैसा लगाना जोखिम भरा और कम मुनाफे वाला सौदा रहा है। निर्माण और जमीन की बढ़ती लागत के कारण यह फंडिंग गैप और बढ़ गया है। इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार नए तरीके खोज रही है। इसमें कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड से चैरिटेबल संस्थानों के जरिए फंडिंग या अटके हुए प्री-RERA प्रोजेक्ट्स के लिए एक खास फंड बनाने जैसे प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है। इंडस्ट्री बॉडी NAREDCO का अनुमान है कि ऐसे अटके प्रोजेक्ट्स के लिए करीब ₹2.5 लाख करोड़ की जरूरत पड़ सकती है। ये प्रस्ताव बताते हैं कि मौजूदा फाइनेंसियल सिस्टम सबसे कमजोर हाउसिंग सेगमेंट की जरूरतों को पूरा करने और पुराने अटके प्रोजेक्ट्स को सुलझाने में नाकाफी है। बढ़ती ब्याज दरें और निर्माण लागत भी अफोर्डेबिलिटी को और मुश्किल बना रही है।
क्या ये समाधान काफी होंगे?
RERA बाइलॉज की केंद्र द्वारा जांच से भले ही नियमों में एकरूपता आए, लेकिन इससे राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखलंदाजी और नौकरशाही का शिकंजा बढ़ने का खतरा है। सुप्रीम कोर्ट की RERA के मौजूदा प्रदर्शन पर गंभीर टिप्पणी, नियमों को लागू करने की ताकत और नियुक्त किए गए लोगों की क्षमता पर सवाल खड़े करती है। अफोर्डेबल हाउसिंग फाइनेंस के लिए चैरिटेबल ट्रस्ट और स्पेशल फंड जैसे नए तरीके शायद फंड की कमी को पूरी तरह से दूर न कर पाएं, खासकर जब बड़ी मात्रा में पूंजी की जरूरत हो। रियल एस्टेट रेगुलेशन का इतिहास बताता है कि RERA जैसे एक्ट ने पारदर्शिता बढ़ाई है, लेकिन उनकी असली कामयाबी राज्यों के बेहतर अमल पर टिकी है, जो अब तक inconsistent रहा है।