RBI का यह प्रस्ताव मौजूदा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव लाने वाला है। अभी तक बैंक मुख्य रूप से स्पेशल पर्पज व्हीकल्स (SPVs) के जरिए ही REITs को फाइनेंस करते थे। लेकिन नए नियम के तहत, बैंक सीधे लिस्टेड REITs को लोन दे पाएंगे। यह डेवलपमेंट, जो लगभग 27 बिलियन डॉलर की संपत्ति वाले भारतीय REITs सेक्टर के लिए है, फंड जुटाने में आसानी और फाइनेंसिंग की लागत कम करने की उम्मीद जगाता है।
हालांकि, इस प्रस्ताव के साथ RBI ने 'एप्रोप्रिएट प्रूडेंशियल सेफगार्ड्स' (appropriate prudential safeguards) का ज़िक्र किया है। यही वो महत्वपूर्ण फैक्टर है जो इस नियम के असली फायदों को सीमित कर सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन 'सेफगार्ड्स' में बैंकों के लिए कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो (capital adequacy ratios), रियल एस्टेट एसेट्स पर खास रिस्क वेट (risk weights) और लोन की लिमिट्स (concentration limits) जैसी शर्तें शामिल हो सकती हैं। ये नियम तय करेंगे कि REITs को कितना और किस कीमत पर बैंक से लोन मिल पाएगा, जिससे तत्काल मिलने वाले लाभ पर असर पड़ सकता है।
रियल एस्टेट की संपत्तियां आमतौर पर लंबे समय तक चलने वाली होती हैं, लेकिन अभी तक REITs को कैपिटल मार्केट से मिलने वाला फाइनेंस अक्सर 3 से 5 साल जैसी छोटी अवधि का होता है। इस वजह से उन्हें बार-बार लोन रि-फाइनेंस (refinance) करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। RBI का यह कदम सीधे तौर पर लंबी अवधि के स्टेबल फाइनेंसिंग का रास्ता खोल सकता है, जो इन संपत्तियों की प्रकृति के अनुकूल हो।
Mindspace Business Parks REIT जैसी कंपनियों का मार्केट कैप करीब ₹15,000 करोड़ है, वहीं Embassy Office Parks REIT का मार्केट कैप लगभग ₹13,000 करोड़ है। इन REITs का वैल्यूएशन नेट एसेट वैल्यू (NAV) और 6-8% के डिविडेंड यील्ड (dividend yield) के आधार पर किया जाता है। Nexus Select Trust (मार्केट कैप करीब ₹7,000 करोड़) और Brookfield India REIT (मार्केट कैप करीब ₹10,000 करोड़) जैसे कई REITs फिलहाल अपने NAV से डिस्काउंट पर ट्रेड कर रहे हैं। यह बताता है कि लंबी अवधि के कैपिटल की उपलब्धता और उसकी लागत REITs के वैल्यूएशन और पोर्टफोलियो विस्तार की क्षमता के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। फिलहाल बढ़ती ब्याज दरें (rising interest rates) भी इन REITs के लिए उधारी की लागत बढ़ा रही हैं।
RBI का यह मूव सरकार के यील्ड इन्वेस्टमेंट मार्केट को मजबूत करने और सरकारी एसेट्स के मोनेटाइजेशन (asset monetization) को तेज करने के बड़े लक्ष्यों के साथ भी जुड़ता है। 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर के बजट में सरकारी कंपनियों (CPSEs) के REITs बनाने की योजनाएं इसी दिशा में बड़ा कदम हैं। साथ ही, 1 जनवरी 2026 से म्यूचुअल फंड्स (mutual funds) के लिए REITs निवेश को शेयरों से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स (equity-related instruments) के तौर पर क्लासिफाई करना भी इस सेक्टर में फंड फ्लो को बढ़ाने में मदद करेगा।
एनालिस्ट्स इस खबर को लेकर सावधानी भरी उम्मीद (cautious optimism) जता रहे हैं। वे इसे रेगुलेटरी कॉन्फिडेंस का पॉजिटिव संकेत तो मान रहे हैं, लेकिन उनका पूरा ध्यान RBI द्वारा लगाए जाने वाले 'सेफगार्ड्स' और इन नियमों के प्रैक्टिकल इम्प्लीकेशंस (practical implications) पर टिका है। यह देखा जाना बाकी है कि ये नए नियम REITs के लिए फंड जुटाने की राह को कितना आसान या मुश्किल बनाते हैं।