EMI में स्थिरता, पर खरीदारों की मुश्किल बरकरार
RBI के इस फैसले से लाखों होम लोन ग्राहकों को राहत मिली है, क्योंकि उनकी EMI (Equated Monthly Installment) में निकट भविष्य में कोई इजाफा नहीं होगा। यह मौजूदा आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच उनके बजट को स्थिर रखने में मददगार साबित होगा। नए खरीदार भी भविष्य के लोन आउटगो का एक स्पष्ट अंदाजा लगा सकेंगे, जिससे वे प्रॉपर्टी खरीदने का फैसला अधिक आत्मविश्वास से ले पाएंगे। इंडस्ट्री के हितधारक इस नीतिगत निरंतरता को एक सकारात्मक संकेत मान रहे हैं, जिससे डेवलपर्स को अपने प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग और एग्जीक्यूशन की योजना बनाने में अधिक निश्चितता मिलेगी। भारत की मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति भी इस स्थिर दृष्टिकोण का समर्थन करती है, जहां Q1 FY26 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान लगभग 7.8% है और केंद्रीय बैंक का महंगाई का लक्ष्य 2% से 6% के बीच है। यह दर्शाता है कि RBI के पास कदम उठाने की गुंजाइश है, लेकिन उसने आक्रामक प्रोत्साहन के बजाय निरंतरता को प्राथमिकता दी है।
अफोर्डेबिलिटी का बढ़ता हुआ गैप
जहां एक ओर स्थिर ब्याज दरों से राहत मिल रही है, वहीं दूसरी ओर हाउसिंग मार्केट एक गंभीर अफोर्डेबिलिटी संकट से जूझ रहा है। रेपो रेट में बदलाव न होने से EMI बढ़ने से तो रुका है, लेकिन प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतों का असर, जो वेतन वृद्धि से कहीं आगे निकल गई हैं, को यह कम नहीं कर पाता। यह स्थिति विशेष रूप से अफोर्डेबल हाउसिंग (Affordable Housing) सेगमेंट में गंभीर है, जहां कुल होम सेल्स में इसका हिस्सा 2019 में 38% से घटकर 2025 में अनुमानित 18% रह गया है [cite:Original Source]। 2026-27 के यूनियन बजट में भी इस महत्वपूर्ण अंतर को पाटने और इस अहम सेगमेंट में सप्लाई या डिमांड को प्रोत्साहित करने के लिए डेवलपर्स या खरीदारों के लिए टैक्स छूट जैसे कोई बड़े नीतिगत उपाय नहीं किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्याज दर में कटौती से बाजार की गतिविधियों को अधिक सीधा बढ़ावा मिलता, जिससे हिचकिचाने वाले खरीदार आकर्षित हो सकते थे [cite:Original Source]1।
सेक्टर का भविष्य: निश्चितता और अटकी हुई मांग
2026 के लिए भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर का आउटलुक इसी दोहरी स्थिति से आकार ले रहा है। जहां नीतिगत निरंतरता और स्थिर ब्याज दरें योजना बनाने और निवेशक के आत्मविश्वास के लिए अनुकूल हैं, वहीं इस सेक्टर को अटकी हुई मांग (Pent-up Demand) को ठोस बिक्री में बदलने के लिए उत्प्रेरकों की आवश्यकता है। 2026-27 का यूनियन बजट व्यापक मांग-समर्थन उपायों के बजाय राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) और निरंतर पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) को बनाए रखने पर केंद्रित रहने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि जहां डेवलपर्स उधार लागत के बारे में निश्चितता के साथ योजना बना सकते हैं, वहीं निकट भविष्य में अफोर्डेबिलिटी के अंतर को पाटने का जिम्मा काफी हद तक बाजार की गतिशीलता और नवीन मूल्य निर्धारण रणनीतियों पर आ सकता है, न कि सीधे नीतिगत समर्थन पर।