NITI Aayog की बड़ी पहल: सस्ते घरों की लागत घटाने के लिए जमीन सुधार का प्रस्ताव

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
NITI Aayog की बड़ी पहल: सस्ते घरों की लागत घटाने के लिए जमीन सुधार का प्रस्ताव

NITI Aayog ने किफायती आवास (Affordable Housing) परियोजनाओं को आर्थिक रूप से अधिक व्यवहार्य बनाने के लिए प्रमुख भूमि सुधारों (Land Reforms) का सुझाव दिया है। इसमें फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) को बढ़ाकर 5 या 6 करना शामिल है। भूमि लागत के बोझ को कम करके, जो अक्सर परियोजना की आधी से अधिक लागत होती है, सरकार आपूर्ति बढ़ाने का लक्ष्य रख रही है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि राज्य सरकारें डेवलपर मार्जिन को बेहतर बनाने के लिए इन नीतिगत बदलावों को कितनी प्रभावी ढंग से अपनाती हैं।

सस्ते घरों को सस्ता बनाने की राह

NITI Aayog ने भारत में किफायती आवास (Affordable Housing) की लागत को कम करने के लिए एक रणनीतिक ढांचा तैयार किया है, जिसमें भूमि उपयोग (Land Use) और शहरी नियोजन (Urban Planning) में महत्वपूर्ण बदलावों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। सदस्य राजीव गौबा ने हाल ही में इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान भूमि लागत, जो अक्सर एक परियोजना के बजट का 50% से 70% तक होती है, कम लागत वाली इकाइयां बनाने के इच्छुक डेवलपर्स के लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

FAR बढ़ाने से कैसे मिलेगी राहत?

प्रस्तावित सुधारों का लक्ष्य भूमि आपूर्ति को खोलना और आवास परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता में सुधार करना है। एक प्रमुख सिफारिश किफायती आवास परियोजनाओं के लिए फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) को 5 या 6 तक बढ़ाना है। सीधे शब्दों में कहें तो FAR यह निर्धारित करता है कि किसी भूमि के टुकड़े पर कितना फर्श स्थान बनाया जा सकता है। इस अनुपात को बढ़ाने से बिल्डरों को एक ही जमीन पर अधिक इकाइयां बनाने की अनुमति मिलती है, जिससे उच्च भूमि लागत को बड़ी संख्या में अपार्टमेंटों में फैलाया जा सकता है और प्रति यूनिट कीमत कम हो सकती है।

अन्य प्रस्ताव और चुनौतियाँ

NITI Aayog और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय की संयुक्त रिपोर्ट में मास्टर प्लान में कम से कम 10% आवासीय भूमि विशेष रूप से किफायती आवास के लिए आरक्षित करने का भी सुझाव दिया गया है। अन्य प्रस्तावों में भूमि पूलिंग (Land Pooling), हस्तांतरणीय विकास अधिकार (Transferable Development Rights) का उपयोग, और भूमि-उपयोग शुल्क (Land-use fees) व स्टाम्प शुल्क (Stamp Duties) में छूट देना शामिल है। सरकार ने यह भी नोट किया है कि उसके पास अप्रयुक्त भूमि का एक महत्वपूर्ण भंडार है जिसका उपयोग आवास के लिए किया जा सकता है।

हालांकि ये सुधार आपूर्ति बढ़ाने के उद्देश्य से हैं, लेकिन इनके कार्यान्वयन में एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती है। भूमि और शहरी नियोजन मुख्य रूप से राज्य और स्थानीय सरकारों के विषय हैं। नतीजतन, इन प्रस्तावों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्तिगत राज्य अपने स्थानीय भवन उपनियमों (Building Bylaws) और नीतियों को इन केंद्रीय सिफारिशों के साथ कितनी प्रभावी ढंग से संरेखित करते हैं। यदि राज्य अपने नियमों में संशोधन करने में धीमे रहे, तो डेवलपर मार्जिन पर प्रभाव और नई आवास आपूर्ति की गति में देरी हो सकती है। यह नीति-कार्यान्वयन अंतर (Policy-implementation gap) एक प्रमुख जोखिम कारक है जो अक्सर रियल एस्टेट क्षेत्र को प्रभावित करता है।

रेंटल हाउसिंग पर भी जोर

रिपोर्ट में रेंटल हाउसिंग (Rental Housing) क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया है, यह देखते हुए कि गृह स्वामित्व हमेशा छात्रों, औद्योगिक श्रमिकों और प्रवासी श्रमिकों जैसी अस्थायी आबादी की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता है। कमजोर किरायेदारी कानूनों (Tenancy Laws) और कम किराये की पैदावार (Rental Yields) जैसे कारकों ने एक करोड़ से अधिक शहरी आवास इकाइयों को निष्क्रिय रखा है, जिससे वे किराये के बाजार में प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं।

निवेशकों के लिए तत्काल निगरानी योग्य पहलू यह है कि राज्य सरकारें इन नीतिगत परिवर्तनों को किस गति से अपनाती हैं। किसी भी वास्तविक भवन मानदंडों में ढील या कर छूट से किफायती आवास खंड पर ध्यान केंद्रित करने वाले डेवलपर्स के लिए परियोजना मार्जिन में सुधार होने की संभावना है, बशर्ते कि नियामक वातावरण अधिक सहायक हो जाए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.