MahaRERA ने घर खरीदारों के लिए **₹369.45 करोड़** की भारी-भरकम राशि रिकवर की है। नियामक ने अपने प्रवर्तन (enforcement) अधिकारों का इस्तेमाल कर डेवलपर्स पर शिकंजा कसा है, जिससे रिकवरी रेट **45%** तक पहुंच गया है। हालांकि, कानूनी विवादों के कारण अभी भी **₹209 करोड़** से ज्यादा की राशि अटकी हुई है।
रिकवरी की रफ्तार कैसे बढ़ी?
MahaRERA ने महाराष्ट्र लैंड रेवेन्यू कोड 1966 का इस्तेमाल करते हुए डेवलपर्स की जवाबदेही तय की है। मई 2017 से अब तक कुल 1,531 शिकायतों पर ₹1,037.86 करोड़ के कंपनसेशन वारंट जारी किए गए थे, जिसमें से ₹369.45 करोड़ की वसूली एक बड़ी उपलब्धि है।
इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रशासन का नया कदम है। राज्य सरकार ने रेजिडेंट डिप्टी कलेक्टर्स और एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर्स को 'रेवेन्यू रिकवरी ऑफिसर्स' के रूप में नियुक्त किया है। इससे नौकरशाही की बाधाएं कम हुई हैं। मुंबई सबअर्बन एरिया इसमें सबसे आगे रहा, जहां ₹142.31 करोड़ की रिकवरी हुई है। पुणे और मुंबई सिटी भी इस लिस्ट में शामिल हैं, जबकि सिंधुदुर्ग और सोलापुर जैसे जिलों ने अपने पेंडिंग मामले लगभग खत्म कर लिए हैं।
कानूनी पचड़ों में कहां फंसा है पैसा?
इतनी कोशिशों के बावजूद, घर खरीदारों तक पूरा पैसा नहीं पहुंच पा रहा है। लगभग ₹209.16 करोड़ की राशि अभी भी कानूनी उलझनों में फंसी है। इसमें से ₹104.70 करोड़ का मामला NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) के पास है, जहां डेवलपर्स के खिलाफ इनसॉल्वेंसी की कार्यवाही चल रही है। वहीं, ₹104.46 करोड़ का मामला MPID एक्ट के तहत फंसा है, जो वित्तीय धोखाधड़ी से संबंधित है।
इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ रहा है। जब कोई कंपनी इनसॉल्वेंसी प्रोसेस में चली जाती है, तो MahaRERA के वारंट की ताकत सीमित हो जाती है। यानी, नियामक की सख्ती के बावजूद, खरीदारों को अपने पैसे के लिए लंबी कानूनी लड़ाई का इंतजार करना पड़ सकता है।
