केरल सरकार अब अपने पुराने लैंड यूटिलाइजेशन और रेवेन्यू कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। इस सुधार का मकसद टूरिज्म और इंडस्ट्रियल सेक्टर में प्रोजेक्ट्स को मिलने वाली मंजूरी को आसान बनाना और नई इन्वेस्टमेंट के लिए जमीन की उपलब्धता को तेज करना है।
केरल सरकार ने इंडस्ट्रियल और टूरिज्म प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन हासिल करने की प्रक्रिया को सरल बनाने का फैसला किया है। राज्य सरकार उन कानूनी बाधाओं को दूर करने की योजना बना रही है, जिनकी वजह से सालों से प्रोजेक्ट्स की रफ्तार धीमी रही है। दशकों पुराने रेवेन्यू कानूनों को आधुनिक बनाने और लैंड सीलिंग के प्रावधानों को आसान बनाकर, सरकार निवेशकों के लिए 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के माहौल को बेहतर बनाना चाहती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और टूरिज्म पर फोकस
प्रस्तावित बदलाव उन कानूनी चुनौतियों को हल करेंगे, जो अक्सर होटल या इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बनती हैं। कैपिटल-इंटेंसिव बिजनेस के लिए जमीन की उपलब्धता सबसे बड़ी चिंता होती है। अगर यह सुधार सफल रहे, तो जमीन अधिग्रहण और जरूरी परमिशन लेने में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा। सरकार का लक्ष्य नई इन्वेस्टमेंट को आकर्षित कर राज्य में रोजगार के अवसर पैदा करना भी है।
रेवेन्यू सेवाओं का डिजिटलीकरण
सिर्फ जमीन मिलना ही नहीं, बल्कि सरकार डिजिटल सेवाओं पर भी जोर दे रही है। विलेज ऑफिस के चक्कर काटने की जरूरत को खत्म करने के लिए डिजिटल लैंड सर्वे पर काम शुरू किया गया है। इसका फायदा यह होगा कि जमीन से जुड़े विवादों में कमी आएगी, जो कि ओनरशिप के लिए एक बड़ी समस्या रहे हैं। राज्य ने हाल ही में 6,000 से ज्यादा लैंड टाइटल बांटे हैं, जो पेंडिंग काम को निपटाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
निवेशकों के लिए जरूरी बातें
सुधारों का फायदा इस पर निर्भर करेगा कि अंतिम लेजिस्लेटिव फ्रेमवर्क कैसा होता है और इसे लागू करने में कितनी तेजी दिखाई जाती है। केरल में जमीन का इस्तेमाल अक्सर एनवायरनमेंटल कंप्लायंस जैसे जटिल नियमों के दायरे में आता है। ऐसे में निवेशकों को सरकार की अगली गाइडलाइंस और इन नियमों के बैलेंस पर नजर रखनी होगी।
