भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर में साल 2026 के शुरुआती 9 महीनों में **US$6.1 बिलियन** का प्राइवेट इक्विटी निवेश आया है। मार्केट में अब कर्ज के बजाय सीधे इक्विटी डील्स पर फोकस बढ़ गया है और घरेलू निवेशकों की भागीदारी भी रिकॉर्ड स्तर पर देखी जा रही है।
इक्विटी की ओर बढ़ता रुझान
निवेश रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अब निवेशक कर्ज के बोझ वाली संरचनाओं (debt-heavy structures) से दूर हो रहे हैं। कुल निवेश का 83% हिस्सा अब प्योर इक्विटी के रूप में आ रहा है, जबकि स्ट्रक्चर्ड डेट (structured debt) का हिस्सा घटकर 16% पर आ गया है, जो कि फाइनेंशियल ईयर 2023 में 32% था। यह बदलाव साफ दिखाता है कि बड़े संस्थान अब शॉर्ट-टर्म डेट की जगह लॉन्ग-टर्म प्रोजेक्ट्स में सीधी ओनरशिप पसंद कर रहे हैं।
घरेलू निवेशकों का दबदबा
इस खेल में अब भारतीय घरेलू संस्थानों की एंट्री दमदार रही है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही में कुल इनफ्लो में घरेलू निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 48% हो गई है, जो फाइनेंशियल ईयर 2025 में मात्र 16% थी। यह संकेत है कि अब भारतीय कंपनियां और फाइनेंशियल फंड्स कमर्शियल ग्रोथ को फंड करने में विदेशी निवेशकों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
रिकॉर्ड तोड़ डिमांड
ऑफिस स्पेस की मांग भी अपने चरम पर है। साल 2026 की पहली तीन तिमाहियों में नेट एब्जॉर्प्शन 42 मिलियन स्क्वायर फीट के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। इस डिमांड के पीछे मुख्य रूप से बैंकिंग सेक्टर और ग्लोबल कैप्टिव सेंटर्स (Global Captive Centers) का विस्तार है।
निवेशकों के सामने चुनौतियां
बाजार में रौनक तो है, लेकिन एक्सपर्ट्स ग्लोबल इकोनॉमिक स्लोडाउन को लेकर सतर्क हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आउटसोर्सिंग सेवाओं की मांग कम होती है, तो ऑफिस स्पेस ऑक्यूपेंसी पर दबाव आ सकता है। साथ ही, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता भी निवेश के फ्लो को प्रभावित कर सकती है।
