प्रॉपर्टी टाइटल सिस्टम में बड़े फ्रॉड का खुलासा
इस ₹500 करोड़ के गुरुरग्राम स्कैम में असल खेल 2021 से 2023 के बीच खेला गया। आरोप है कि 3,000 स्क्वायर फीट का एक कमर्शियल फ्लोर कई लोगों को बेच दिया गया। हैरानी की बात यह है कि कई खरीदारों के पास रजिस्टर्ड डॉक्यूमेंट्स होने के बावजूद उन्हें प्रॉपर्टी पर मालिकाना हक नहीं मिला। इस मामले में कंपनी के CEO, ध्रुव दत्त शर्मा को गिरफ्तार किया गया है। उन पर नकली एग्रीमेंट (fake agreements) बनाने और मालिकाना हक ट्रांसफर करने में देरी करने का आरोप है। यह घटना साफ दिखाती है कि भारत में प्रॉपर्टी टाइटल को लेकर मौजूदा नियम कितने कमजोर हैं और प्रॉपर्टी निवेश की सुरक्षा के लिए मजबूत सिस्टम की तत्काल जरूरत है।
रियल एस्टेट मार्केट पर असर और रेगुलेटरी गैप
यह बड़ा स्कैम भारत के रियल एस्टेट मार्केट के लिए एक चिंता का विषय है, खासकर तब जब मार्केट ग्रोथ की अच्छी उम्मीदें लगाई जा रही थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2025 में इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट (institutional investment) ने रिकॉर्ड $7.5 बिलियन का आंकड़ा छुआ था। ऐसे में गुरुरग्राम का यह मामला प्रॉपर्टी सेक्टर में गहरे जड़ें जमा चुकी समस्याओं को दिखाता है, जो भविष्य में विदेशी निवेश को डरा सकता है। मौजूदा रेगुलेशंस, जैसे कि RERA, इस तरह के बड़े टाइटल फ्रॉड को रोकने में अपर्याप्त दिख रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब भारत में ऐसे बड़े जमीन घोटाले सामने आए हैं; आदर्श हाउसिंग सोसाइटी और कर्नाटक वक्फ बोर्ड लैंड स्कैम जैसे मामले भी इसका इतिहास बताते हैं। जमीन का एडमिनिस्ट्रेशन (land administration) भी बहुत कॉम्प्लेक्स है, जो अलग-अलग सरकारी विभागों (रजिस्ट्रेशन, सर्वे, रेवेन्यू) में बंटा हुआ है, जिससे समस्या और बढ़ जाती है। खराब कोऑर्डिनेशन और पुराने पेपर-बेस्ड सिस्टम गलतियों, धोखाधड़ी और देरी का घर हैं।
निवेशकों के जोखिम और ड्यू डिलिजेंस (Due Diligence)
गुरुरग्राम फ्रॉड ने निवेशकों की सुरक्षा में एक बड़ी खामी को उजागर किया है। लीगल तरीके से रजिस्टर्ड डॉक्यूमेंट्स होने का मतलब यह नहीं है कि प्रॉपर्टी पर आपका हक पक्का है। आरोप है कि इस स्कैम में प्रॉपर्टी को कई बार बेचने के बाद, संबंधित कंपनियों के जरिए दोबारा लीज पर दिया गया। इससे गुरुरग्राम जैसे इलाकों में कमर्शियल प्रॉपर्टी में निवेश का जोखिम काफी बढ़ गया है, भले ही वहां बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजनेस की डिमांड हो। सबसे बड़ी समस्या 'प्रिज़म्पटिव टाइटल सिस्टम' (presumptive title system) है: इसमें खरीदार को खुद साबित करना होता है कि उसका मालिकाना हक वैध है, और अगर कोई पुराना दावा या धोखाधड़ी सामने आती है तो सालों तक महंगी कानूनी लड़ाइयों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि टाइटल इंश्योरेंस (title insurance) अब उपलब्ध हो रहा है, लेकिन कई खरीदार अभी भी इसकी सुरक्षा से वंचित हैं।
निवेश सुरक्षा और भविष्य के समाधान
गुरुरग्राम का यह मामला निवेशकों के लिए एक सख्त चेतावनी है: सिर्फ कागजात होना प्रॉपर्टी का मालिक बनना नहीं है। खरीदारों को किसी भी डील से पहले प्रॉपर्टी के लीगल पेपर्स की पूरी जांच करनी चाहिए, मालिकाना हक का इतिहास वेरिफाई करना चाहिए, प्रॉपर्टी पर किसी तरह के कर्ज (liens) की जांच करनी चाहिए और एक्सपर्ट वकील की सलाह लेनी चाहिए। डिजिटाइजेशन और ब्लॉकचेन जैसी नई टेक्नोलॉजी को पारदर्शिता और सुरक्षा बढ़ाने के लिए विचाराधीन तो रखा जा रहा है, लेकिन इन्हें बड़े पैमाने पर लागू करना एक बड़ी चुनौती है। जब तक भारत एक ऐसा सिस्टम नहीं अपनाता जो मालिकाना हक की गारंटी दे या मौजूदा सुरक्षा उपायों में काफी सुधार न करे, तब तक बड़े प्रॉपर्टी स्कैम रियल एस्टेट मार्केट को खतरे में डालते रहेंगे, जिससे निवेशकों का भरोसा टूटेगा और ग्रोथ धीमी पड़ सकती है।