सरकार अपने Digital India Land Records Modernisation Programme (DILRMP) को तेज कर रही है, ताकि **1,626** अटके हुए रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स के विवादों को सुलझाया जा सके। इन प्रोजेक्ट्स में **₹10 लाख करोड़** से ज्यादा का निवेश फंसा हुआ है।
भारत सरकार रियल एस्टेट सेक्टर की सबसे बड़ी चुनौती, यानी अटके हुए प्रोजेक्ट्स को हल करने के लिए जमीन के रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने पर जोर दे रही है। फिलहाल देश में 1,626 प्रोजेक्ट्स फंसे हुए हैं, जिनमें करीब ₹10.79 लाख करोड़ की पूंजी अटकी है। यह स्थिति न केवल बिल्डर्स के लिए मुसीबत बनी है, बल्कि उन बैंकों और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों पर भी दबाव डाल रही है, जिन्होंने इन प्रोजेक्ट्स को लोन दिया है।
डेटा के आधुनिकीकरण का जाल
इस अभियान की मुख्य कड़ी DILRMP प्रोग्राम है। इसका मकसद कागजी और विवादित रिकॉर्ड्स को खत्म कर उन्हें डिजिटल स्टैंडर्ड्स में बदलना है। सरकार National Generic Document Registration System (NGDRS) लागू कर रही है, जो प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन को ऑटोमेट करेगा। इसके अलावा, जमीन के हर टुकड़े को एक यूनिक पहचान देने के लिए ULPIN (Unique Land Parcel Identification Number) का इस्तेमाल हो रहा है। इसे जमीन का 'आधार नंबर' माना जा सकता है। साथ ही, SVAMITVA स्कीम के तहत ड्रोन मैपिंग का काम भी तेजी से चल रहा है और 98% से ज्यादा ग्रामीण रिकॉर्ड्स को अब कंप्यूटराइज किया जा चुका है।
निवेशकों के लिए संकेत
रियल एस्टेट डेवलपर्स और फाइनेंस कंपनियों में निवेश करने वालों के लिए यह एक स्ट्रक्चरल बदलाव है। अभी तक जमीन के टाइटल साफ न होने की वजह से प्रोजेक्ट्स सालों तक अदालतों में फंसे रहते थे। डिजिटल सिस्टम आने से ड्यू डिलिजेंस (Due Diligence) में लगने वाला समय कम होगा और प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने में तेजी आएगी। अगर यह सिस्टम सफल होता है, तो बैंकों के लिए इस सेक्टर में लैंडिंग का रिस्क कम हो जाएगा।
रिस्क और चुनौतियां
तकनीक अच्छी है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। डेटा को डिजिटल करने का मतलब यह नहीं कि पुराना कानूनी विवाद खत्म हो जाए। अगर जमीन पहले से किसी विवाद में है, तो डिजिटल रिकॉर्ड्स में भी वही विवाद दिखेगा। पूरी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें अपने पुराने रिकॉर्ड्स (Legacy Data) को कितनी जल्दी और कितनी सटीकता के साथ वेरीफाई कर इंटीग्रेट करती हैं।
