भारत का रेजिडेंशियल मार्केट (residential market) अब बड़े Tier-I मेट्रो शहरों से निकलकर तेजी से विकसित हो रहे Tier-II और Tier-III शहरों की ओर बढ़ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह affordability यानी खरीदने की क्षमता की कमी है। मेट्रो शहरों में घरों की कीमतें आम लोगों की आमदनी के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ी हैं। 2022 से 2024 के बीच, Tier-I शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें ₹11,000 प्रति वर्ग फुट तक पहुंच गई हैं, जिससे आम आदमी के लिए घर खरीदना मुश्किल हो गया है।
छोटे शहर बन रहे नए 'रियल एस्टेट हब'
इसके उलट, Tier-II और Tier-III शहरों में प्रॉपर्टी मार्केट का ग्रोथ काफी सस्टेनेबल (sustainable) है। यहाँ प्रॉपर्टी खरीदने का शुरुआती खर्च (entry ticket size) कम है और कीमतों का आमदनी से अच्छा तालमेल है, जिससे ज्यादा लोग घर खरीद पा रहे हैं। सरकारी स्कीमें जैसे Smart Cities Mission और AMRUT के तहत यहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure), जैसे नई सड़कें, एक्सप्रेसवे और डिजिटल नेटवर्क, को बेहतर बनाया जा रहा है। इससे कनेक्टिविटी (connectivity) और आर्थिक मजबूती बढ़ी है। साथ ही, गैर-मेट्रो शहरों में formal job creation भी बढ़ा है, जिसमें Tier-III शहर 40% रोजगार के साथ सबसे आगे हैं, और Tier-II शहर 29% पर हैं। IT, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टरों में बढ़ते रोजगार इन नए हब में डिमांड बढ़ा रहे हैं। उम्मीद है कि 2026 तक Tier-II शहरों की भूमिका और बढ़ेगी, जहाँ affordability और demand absorption (डिमांड सोखने की क्षमता) बेहतर होगी।
डेवलपर्स की नजरें अब छोटे शहरों पर
रियल एस्टेट सेक्टर की बड़ी कंपनियां जैसे DLF, Lodha Developers और Godrej Properties के P/E (Price-to-Earnings) रेशियो पर नजर डालें तो DLF का 30.3x, Lodha का 25.9x और Godrej Properties का 27.3x (मार्च 2024 का डेटा) है। वहीं, पूरे BSE Realty इंडेक्स का P/E 34.7x है, जो बताता है कि सेक्टर को भविष्य की ग्रोथ के लिए वैल्यू किया जा रहा है। अब फोकस बड़े शहरों में जल्दी मुनाफा कमाने से हटकर रोजगार, affordability और रीजनल डाइवर्सिफिकेशन (regional diversification) पर आधारित ग्रोथ पर शिफ्ट हो रहा है (2026-2028 के लिए)। डेवलपर्स Tier-II और Tier-III शहरों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं क्योंकि यहाँ जमीन सस्ती है और लोकल डिमांड भी मजबूत है, जिससे नए प्रोजेक्ट बनाना ज्यादा व्यवहारिक हो जाता है। भारत की अनुमानित 7.5% GDP ग्रोथ (FY26 के लिए) इस ट्रांजिशन के लिए एक सपोर्टिव माहौल बना रही है।
क्या हैं आगे के खतरे?
हालांकि, इन छोटे शहरों के उज्ज्वल भविष्य के साथ कुछ खतरे भी जुड़े हैं। इन बढ़ते इलाकों में कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी इन्हें भी जल्द ही महंगा बना सकती है, जैसा कि Tier-I शहरों में हुआ है। ग्लोबल घटनाएं, जैसे मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, महंगाई को बढ़ा सकती हैं। ऐसे में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ब्याज दरों को ऊंचा रख सकता है या कटौती में देरी कर सकता है, जिससे आम और निम्न-आय वर्ग के खरीदारों की affordability प्रभावित हो सकती है। डेवलपर्स को मार्जिन पर दबाव झेलना पड़ सकता है अगर वे कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का बोझ खरीदारों पर न डाल सकें। 2024 में कुछ Tier-II शहरों में speculative buying (सट्टेबाजी वाली खरीद) से कीमतें बढ़ीं, जो एक जोखिम है। इन इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी या खराब प्लानिंग भी ग्रोथ को धीमा कर सकती है। खरीदार भी जल्दी कीमतों में बढ़ोतरी के बजाय लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल सिक्योरिटी पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं।
विश्लेषकों को है इन शहरों से उम्मीद
विश्लेषकों का मानना है कि Tier-II और Tier-III शहर 2026 और उसके बाद भी लगातार बढ़ते रहेंगे, जिसकी वजह लगातार रोजगार के अवसर और सरकारी सहायता है। Cushman & Wakefield का अनुमान है कि 2026 में भारत में घरों की कीमतों में मध्यम बढ़ोतरी होगी, खासकर मध्य-वर्ग के खरीदार ब्याज दरों में संभावित कटौती का फायदा उठा सकते हैं। PM Gati Shakti जैसे सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान इन क्षेत्रों में प्रॉपर्टी वैल्यू और एक्टिविटी को और बढ़ावा देंगे। मेट्रो शहरों में ग्रोथ धीमी हो सकती है, लेकिन छोटे शहरों की ओर यह रुझान पूरे मार्केट की रफ्तार बनाए रखेगा, हालांकि खरीदार ज्यादा सिलेक्टिव (selective) और वैल्यू-फोक्स्ड (value-focused) रहेंगे।
