हरित ऊर्जा का धमाका! भारत में ₹1 लाख करोड़ का लैंड मार्केट और इंडस्ट्रियल स्पेस बूम

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AuthorMehul Desai|Published at:
हरित ऊर्जा का धमाका! भारत में ₹1 लाख करोड़ का लैंड मार्केट और इंडस्ट्रियल स्पेस बूम
Overview

भारत के महत्वाकांक्षी रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्यों के चलते देश का रियल एस्टेट मार्केट एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। 2030 तक 270-300 GW क्षमता हासिल करने के लिए करीब 7 लाख एकड़ जमीन की जरूरत होगी। इस ज़बरदस्त मांग ने $10-15 अरब का एक नया लैंड मार्केट तैयार कर दिया है और खास तौर पर रिन्यूएबल एनर्जी उपकरण बनाने वाली कंपनियों (OEMs) के लिए इंडस्ट्रियल और वेयरहाउसिंग स्पेस की मांग चार गुना बढ़ा दी है। चेन्नई और पुणे इस मांग में सबसे आगे हैं।

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रिन्यूएबल एनर्जी से बदल रही है भारत की जमीन और रियल एस्टेट की तस्वीर

भारत में क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ता रुझान देश के रियल एस्टेट परिदृश्य को गहराई से बदल रहा है। सिर्फ ऊर्जा परिवर्तन ही नहीं, बल्कि रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स के लिए आवश्यक विशाल भूमि अधिग्रहण भी एक बड़ा अवसर पैदा कर रहा है। इसने इंडस्ट्रियल और वेयरहाउसिंग सुविधाओं की मांग को खूब बढ़ाया है, खासकर उन ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) के लिए जो इस क्षेत्र को सपोर्ट करते हैं।

अरबों डॉलर का लैंड मार्केट तैयार

2030 तक 270-300 GW सौर और पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ने के अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए, भारत को अनुमानित 7 लाख एकड़ जमीन की आवश्यकता होगी। इस भारी-भरकम जरूरत से $10 अरब से $15 अरब के मूल्य का एक आकर्षक भूमि एकत्रीकरण और अधिग्रहण बाजार बन रहा है। व्यापक रिन्यूएबल एनर्जी क्षेत्र से कुल निवेश $110-120 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है, जो विकास के भारी पैमाने को दर्शाता है।

इंडस्ट्रियल और वेयरहाउस की मांग में बेतहाशा वृद्धि

रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के विस्तार से इंडस्ट्रियल और वेयरहाउसिंग क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण उछाल आया है। रिन्यूएबल एनर्जी OEMs सक्रिय रूप से ग्रेड ए (Grade A) इंडस्ट्रियल और वेयरहाउसिंग स्पेस की तलाश कर रहे हैं। 2021 से 2025 तक, इन कंपनियों ने प्रमुख भारतीय शहरों में 6.1 मिलियन वर्ग फुट जगह की मांग की है। इस सेगमेंट में उनकी कुल मांग का हिस्सा दोगुना से अधिक हो गया है, जो 2021 में 3% से बढ़कर 2025 तक 8% होने की उम्मीद है।

OEM लीजिंग में चार गुना बढ़ोतरी

रिन्यूएबल एनर्जी OEMs द्वारा लीजिंग एक्टिविटी पिछले पांच वर्षों में चार गुना बढ़ गई है। 2025 तक, यह लीजिंग सालाना लगभग 3 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंचने का अनुमान है। चेन्नई और पुणे इस मांग का नेतृत्व कर रहे हैं, जो 2021 से अब तक की मांग का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हैं। 2030 तक, इन OEMs द्वारा ग्रेड ए स्पेस की वार्षिक मांग 4-7 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंच सकती है, जो कुल इंडस्ट्रियल और वेयरहाउसिंग मांग का 10-15% होगी। यह वृद्धि सोलर पैनल, विंड टरबाइन और बैटरी स्टोरेज सिस्टम जैसे प्रमुख घटकों के बढ़ते घरेलू निर्माण से प्रेरित है।

रियल एस्टेट पर व्यापक प्रभाव

रिन्यूएबल एनर्जी में भारी निवेश से रियल एस्टेट के अन्य सेगमेंट में भी मांग बढ़ने की संभावना है। रिन्यूएबल एनर्जी हब के विकास से किफायती आवास और इंडस्ट्रियल टाउनशिप की आवश्यकता बढ़ सकती है। इसके अलावा, विनिर्माण सुविधाओं और संचालन केंद्रों के विस्तार से ऑफिस स्पेस, ट्रेनिंग सेंटर और स्थानीय सेवा हब की मांग बढ़ेगी, खासकर टियर-II और टियर-III शहरों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

सेक्टर का आउटलुक

रिन्यूएबल एनर्जी क्षेत्र का रियल एस्टेट पर प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण रुझान है। अन्य विनिर्माण क्षेत्रों में भी इंडस्ट्रियल स्पेस की मांग बढ़ रही है, लेकिन रिन्यूएबल एनर्जी OEMs द्वारा प्रेरित पैमाना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एनालिस्ट रिपोर्ट्स ग्रेड ए इंडस्ट्रियल और वेयरहाउसिंग मांग में लगातार मजबूत वृद्धि की भविष्यवाणी करती हैं, जो लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण हब में डेवलपर्स और निवेशकों के लिए एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। घरेलू विनिर्माण के लिए सरकारी समर्थन इस प्रवृत्ति को और मजबूत करता है, जो अगले दशक के लिए निरंतर गति का सुझाव देता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.