भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट तेजी से बदल रहा है। अनुमान है कि **2026** तक कुल लीजिंग में ग्रीन-सर्टिफाइड बिल्डिंग्स की हिस्सेदारी बढ़कर **85%** हो जाएगी, जो **2023** में **74%** थी।
भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव आ रहा है। सस्टेनेबिलिटी अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि संस्थागत किरायेदारों (Institutional Tenants) की पहली पसंद बन गई है। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि मार्केट अब प्रीमियम, सस्टेनेबल संपत्तियों और पुरानी, नॉन-कंप्लायंट प्रॉपर्टीज के बीच स्पष्ट अंतर करने लगा है।
रेंटल यील्ड और डिमांड का बदलता गणित
बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां और Global Capability Centres (GCCs) अब सिर्फ वही ऑफिस स्पेस तलाश रहे हैं जो ग्लोबल ESG मानकों पर खरे उतरते हों। इस बढ़ती डिमांड के कारण 'टू-टियर' मार्केट बन रहा है। LEED, IGBC और GRIHA जैसे सर्टिफिकेट वाली बिल्डिंग्स को नॉन-सर्टिफाइड प्रॉपर्टीज की तुलना में 8% से 15% तक ज्यादा रेंटल प्रीमियम मिल रहा है। किरायेदारों को लुभाने की मुख्य वजह इन बिल्डिंग्स की कम ऑपरेशनल कॉस्ट और एनर्जी एफिशिएंसी है।
रिस्क और वैल्युएशन का दबाव
सर्टिफिकेशन होना ही काफी नहीं है, अब कंपनियां बिल्डिंग्स का रियल-टाइम डेटा, जैसे एनर्जी कंजम्पशन और कार्बन फुटप्रिंट भी मांग रही हैं। वहीं, पुरानी बिल्डिंग्स के मालिकों के लिए 'ब्राउन डिस्काउंट' (Brown Discount) का खतरा बढ़ गया है। जो प्रॉपर्टीज ग्रीन मानकों के अनुकूल नहीं हैं, उनकी वैल्यू कम हो सकती है और खाली रहने की दर (Vacancy Rate) भी बढ़ सकती है। डेवलपर्स को अब पुरानी बिल्डिंग्स को रेट्रोफिट (Retrofit) करने पर भारी पूंजी खर्च करनी पड़ेगी, जिससे शॉर्ट टर्म में उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है।
निवेशकों के लिए जरूरी बातें
2026 तक देश में ग्रीन-सर्टिफाइड ऑफिस स्टॉक बढ़कर लगभग 800 मिलियन स्क्वायर फीट होने का अनुमान है। निवेशकों को सलाह है कि वे डेवलपर्स के पोर्टफोलियो पर नजर रखें। यह देखें कि उनकी कितनी संपत्तियां ग्रीन-सर्टिफाइड हैं और पुरानी प्रॉपर्टीज के अपग्रेड पर कितना खर्च किया जा रहा है। लंबे समय में वही रियल एस्टेट कंपनियां टिक पाएंगी जो नए ग्रीन सप्लाई के साथ-साथ पुरानी संपत्तियों को आधुनिक बनाने का संतुलन बना सकेंगी।
