भारत के फ्लेक्सिबल वर्कस्पेस सेक्टर में साल 2026 की पहली छमाही में ऐतिहासिक तेजी देखी गई है। लीजिंग वॉल्यूम **55%** बढ़कर **8.4 मिलियन** स्क्वायर फीट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। साल 2026 की पहली छमाही (H1) में फ्लेक्सिबल वर्कस्पेस की लीजिंग में 55% का उछाल आया है, जो बताता है कि कंपनियां अब ट्रेडिशनल लॉन्ग-टर्म लीज की जगह फ्लेक्सिबल और मैनेज्ड ऑफिस स्पेस को प्राथमिकता दे रही हैं।
आंकड़ों के अनुसार, देश के 8 बड़े बाजारों में फ्लेक्सिबल ऑपरेटर्स ने 191,306 सीटें लीज पर दी हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 68.4% अधिक है। यह निवेशकों के लिए एक बड़ा संकेत है कि फ्लेक्सिबल ऑफिस अब सिर्फ स्टार्टअप्स तक सीमित नहीं, बल्कि बड़ी ग्लोबल कंपनियों की मुख्य रणनीति बन गई है।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) का प्रभाव
इस मांग के पीछे सबसे बड़ा कारण Global Capability Centres (GCC) हैं। ये सेंटर कुल लीजिंग का 44% हिस्सा हैं। कंपनियां अब रियल एस्टेट के स्वामित्व के जोखिम से बचने के लिए मैनेज्ड ऑफिस चुन रही हैं, जिससे उन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से ऑपरेशंस को स्केल करने की आजादी मिलती है।
बेंगलुरु से आगे बढ़ा दायरा
बेंगलुरु का मार्केट 30% हिस्सेदारी के साथ टॉप पर बना हुआ है, लेकिन अब सेकेंडरी शहरों में भी जबरदस्त तेजी है। हैदराबाद में 170.8%, दिल्ली NCR में 152.7% और मुंबई में 130% की ग्रोथ देखी गई है।
निवेशकों के लिए जोखिम और सावधानी
ग्रोथ शानदार है, लेकिन निवेशकों को मार्केट सैचुरेशन (Saturation) के जोखिम को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कंपनियां वापस ट्रेडिशनल लीजिंग मॉडल की ओर लौटती हैं, तो ऑक्यूपेंसी रेट पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, IT सेक्टर पर अधिक निर्भरता और ऑपरेटर्स की हाई ऑपरेशनल कॉस्ट भी मुनाफे के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। निवेशकों को कंपनियों की डेट मैनेजमेंट और कैश फ्लो पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
