Indian Retailers Pivot to Micro-Markets Amid High Mall Rents

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian Retailers Pivot to Micro-Markets Amid High Mall Rents

बड़े मॉल्स से छोटे 'सिटी स्टोर्स' की ओर बढ़ रहे हैं बड़े रिटेल ब्रांड्स, किराए का खर्च कंट्रोल करने और सेल्स बढ़ाने की है ये स्ट्रेटेजी।

भारतीय रिटेल सेक्टर में बड़ा बदलाव

भारतीय रिटेल सेक्टर एक बड़ी स्ट्रैटेजिक शिफ्ट देख रहा है। बड़े, डेस्टिनेशन-सेंट्रिक मॉल्स से निकलकर अब बड़े ब्रांड्स छोटे 'सिटी स्टोर्स' की ओर रुख कर रहे हैं, जो आसानी से पहुंचने वाले माइक्रो-मार्केट्स में स्थित हैं। यह बदलाव रियल एस्टेट की बढ़ती लागतों और बदलते कंज्यूमर बिहेवियर का नतीजा है। अब ब्रांड्स मॉल्स की बजाय सीधे रेजिडेंशियल लेन और बिज़ी हाई-स्ट्रीट्स में अपनी दुकानें खोल रहे हैं, ताकि ग्राहक आसानी से आ-जा सकें और बार-बार खरीदारी करें।

आर्थिक वजहें

इस शिफ्ट का मुख्य कारण बड़े फॉर्मेट वाले मॉल्स के हाई ऑपरेशनल कॉस्ट्स हैं। विशाल स्पेस को बनाए रखने के लिए भारी-भरकम किराया और कॉमन एरिया मेंटेनेंस (CAM) चार्जेज देने पड़ते हैं, जो मुनाफे पर भारी पड़ सकता है। इसके मुकाबले, छोटे फॉर्मेट्स रिटेलर्स को अपने फिक्स्ड कॉस्ट्स और फुटप्रिंट को कम करने की सुविधा देते हैं। इससे कंपनियों का फाइनेंशियल रिस्क भी कम हो जाता है, क्योंकि छोटे स्पेस को मैनेज करना आसान होता है। बेंगलुरु के ORR-Whitefield-Sarjapur बेल्ट या दिल्ली-NCR की पॉपुलर हाई-स्ट्रीट्स जैसे माइक्रो-मार्केट्स को चुनकर, कंपनियां सीधे कंज्यूमर की डेली लाइफ का हिस्सा बनने की कोशिश कर रही हैं। इससे वीकेंड फुटफॉल पर निर्भर रहने के बजाय लगातार रिपीट परचेज को बढ़ावा मिलता है।

ऑपरेशनल और फाइनेंशियल रिस्क

हालांकि, इस स्ट्रैटेजी के अपने फायदे हैं, लेकिन यह रिटेल बिजनेसेज के लिए कुछ खास चुनौतियाँ भी पैदा करती है। छोटे, डिसेंट्रलाइज्ड स्टोर्स में जाने से सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स कॉम्प्लिकेटेड हो जाते हैं। कई छोटी लोकेशंस पर इन्वेंट्री को फिर से भरना एक बड़े फॉर्मेट वाले स्टोर को सप्लाई करने से कहीं ज़्यादा महंगा और मुश्किल होता है। अगर कोई कंपनी अपने डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को ऑप्टिमाइज़ नहीं कर पाती है, तो बढ़े हुए ऑपरेशनल खर्चे प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकते हैं।

इसके अलावा, इन्वेस्टर्स को इन माइक्रो-मार्केट्स में रेंट इन्फ्लेशन के रिस्क पर भी नज़र रखनी चाहिए। जैसे-जैसे ज़्यादा ब्रांड्स पॉपुलर नेबरहुड मार्केट्स में जगह के लिए कॉम्पिटिशन करेंगे, हाई-स्ट्रीट रेंट बढ़ सकते हैं, जिससे रिटेलर्स को मूल रूप से मिलने वाला कॉस्ट एडवांटेज कम हो सकता है। पारंपरिक मॉल डेवलपर्स को भी इनोवेट करने का दबाव झेलना पड़ रहा है, वरना उनके ऑक्यूपेंसी में गिरावट का खतरा है, क्योंकि बड़े टेनेंट्स अब ज़्यादा फ्लेक्सिबल और लोकलाइज्ड ऑप्शन्स की ओर बढ़ रहे हैं। 'सिटी स्टोर' मॉडल की लॉन्ग-टर्म सक्सेस इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या रिटेलर्स इन लॉजिस्टिकल कॉम्प्लेक्सिटीज और रेंटल मार्केट डायनामिक्स को नेविगेट करते हुए प्रॉफिटेबिलिटी बनाए रख पाते हैं।

इन्वेस्टर्स को स्टोर्स की संख्या में ग्रोथ, रेवेन्यू के मुकाबले किराए का रेशियो और ऑपरेटिंग मार्जिन्स के बारे में कंपनी के तिमाही अपडेट्स को ट्रैक करना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि माइक्रो-मार्केट्स में जाने से रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) में सुधार हो रहा है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.