भारतीयों के बीच विदेश में प्रॉपर्टी खरीदने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। अपनी दौलत को अलग-अलग जगहों पर बांटने (Diversification) की चाहत और विदेश में पढ़ रहे बच्चों के लिए घर जैसी सुविधाओं की जरूरत इस रुझान को बल दे रही है।
इस विदेशी निवेश को रेगुलेट करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) है। इसके तहत, हर भारतीय नागरिक हर साल $250,000 तक की रकम विदेश भेज सकता है। बड़े निवेश के लिए परिवार भी अपनी लिमिट को जोड़ सकते हैं।
बजट 2026-27 में सरकार ने इस निवेश को और आसान और आकर्षक बनाने के लिए कुछ बड़े कदम उठाए हैं।
- विदेशों में टूर पैकेज, पढ़ाई या मेडिकल खर्चों के लिए भेजे जाने वाले पैसे पर टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS) की दर को घटाकर 2% कर दिया गया है, जो पहले 5% या 20% तक थी। इससे लोगों को थोड़ी राहत मिलेगी।
- एक और बड़ा बदलाव यह है कि 1 अक्टूबर, 2026 से गैर-निवासियों (Non-residents) की प्रॉपर्टी बेचने का प्रोसेस आसान हो जाएगा। खरीदारों को अब प्रॉपर्टी खरीदने के लिए टैक्स डिडक्शन एंड कलेक्शन अकाउंट नंबर (TAN) लेने की जरूरत नहीं होगी, वे अपने परमानेंट अकाउंट नंबर (PAN) का इस्तेमाल कर सकेंगे।
हालांकि, विदेश में प्रॉपर्टी में निवेश करते समय भारतीय टैक्स नियमों का पालन करना जरूरी है। अपनी विदेशी संपत्ति की पूरी जानकारी इनकम टैक्स रिटर्न में देना अनिवार्य है, वरना भारी जुर्माने और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। विदेश से होने वाली किराए की कमाई (Rental Income) और प्रॉपर्टी बेचने पर होने वाले लाभ (Capital Gains) पर भारत में टैक्स लगेगा।
लेकिन, दो देशों में एक ही आमदनी पर टैक्स लगने (Double Taxation) से बचाने के लिए भारत ने कई देशों के साथ डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट्स (DTAAs) किए हैं। इन समझौतों के तहत, आप विदेश में भरे गए टैक्स के लिए भारत में क्रेडिट (Foreign Tax Credit - FTC) का दावा कर सकते हैं, जिससे आपकी कुल टैक्स देनदारी कम हो जाती है।
यह सब तब हो रहा है जब ग्लोबल रियल एस्टेट मार्केट में भी 2026 तक रिकवरी की उम्मीद है। माना जा रहा है कि $144 बिलियन का बड़ा निवेश इस सेक्टर में आ सकता है। भारतीय निवेशक भी इस ग्लोबल रियल एस्टेट बूम का फायदा उठाने के लिए तैयार दिख रहे हैं।