भारत के रियल एस्टेट बाजार में बड़े बदलाव दिख रहे हैं। साल 2026 के पहले नौ महीनों में ऑफिस स्पेस में इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट **46%** बढ़कर **$2.16 बिलियन** पर पहुंच गया है, जबकि रेजिडेंशियल सेक्टर में निवेश **39%** गिरकर **$695 मिलियन** रह गया है।
भारतीय रियल एस्टेट मार्केट में इन दिनों निवेशकों का नजरिया बिल्कुल स्पष्ट है। जहां कमर्शियल ऑफिस स्पेस पर बड़े निवेशक दांव लगा रहे हैं, वहीं रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स से नई पूंजी का बहाव कम होता दिख रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, 90% से ज्यादा निवेश घरेलू निवेशकों की तरफ से आया है। ऑफिस स्पेस की मांग मुख्य रूप से मल्टीनेशनल कंपनियों और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की ओर से आ रही है, जो इसे सुरक्षित और स्थिर रिटर्न वाला निवेश मानते हैं।
रेजिडेंशियल मार्केट में क्यों आई गिरावट?
रेजिडेंशियल सेक्टर में निवेश का गिरना बाजार में डिमांड की कमी नहीं, बल्कि डेवलपर्स की बदलती स्ट्रैटेजी को दिखाता है। अब बिल्डर्स बाहरी फंडिंग के बजाय अपनी 'इंटरनल अक्रुअल्स' (इंटरनल कैश) पर भरोसा कर रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अनसोल्ड इन्वेंट्री का बढ़ना है। 2026 की पहली छमाही तक प्रमुख भारतीय शहरों में बिना बिके घरों की संख्या 5,25,000 यूनिट्स के पार पहुंच गई है।
अन्य सेक्टर का हाल:
- रिटेल रियल एस्टेट: इस सेक्टर में निवेश 78% की भारी गिरावट के साथ करीब $85 मिलियन रह गया है।
- इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक्स: सप्लाई चेन में सुधार के चलते इस सेक्टर में 15% की ग्रोथ देखी गई है और निवेश $371.9 मिलियन तक पहुंचा है।
आने वाले समय में निवेशकों के लिए रेजिडेंशियल मार्केट में 'इन्वेंट्री-टू-सेल्स रेशियो' को ट्रैक करना बेहद जरूरी होगा। यदि इन्वेंट्री का स्तर ऊंचा बना रहता है, तो यह आने वाली तिमाहियों में डेवलपर्स के मार्जिन और कीमतों पर दबाव बना सकता है।
