साल 2026 में भारत के ऑफिस मार्केट में सप्लाई की कमी और डिमांड में जबरदस्त तेजी देखी जा रही है। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की बढ़ती मांग के कारण रेंट में **9%** की बढ़ोतरी हुई है और वैकेंसी रेट अपने निचले स्तर पर पहुंच गए हैं।
भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर में फिलहाल डिमांड और सप्लाई के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। साल 2026 की पहली छमाही के आंकड़ों के मुताबिक, कंपनियों द्वारा लीज पर लिए गए ऑफिस स्पेस यानी 'एब्सॉर्प्शन' का आंकड़ा 27.4 मिलियन स्क्वायर फीट रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 2% ज्यादा है। वहीं, नई कंस्ट्रक्शन में 10% की गिरावट दर्ज की गई है, जिससे कुल पूरा हुआ काम 22.2 मिलियन स्क्वायर फीट पर ही सिमट गया है।
डिमांड और सप्लाई के इस अंतर ने नेशनल वैकेंसी रेट को 15% के मल्टी-ईयर लो पर ला खड़ा किया है। बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे प्रमुख शहरों में ऑफिस रेंट में 9% की सालाना बढ़ोतरी हुई है, जिससे प्रॉपर्टी मालिकों की बारगेनिंग पावर काफी बढ़ गई है।
GCCs की बढ़ती भूमिका
इस ग्रोथ के पीछे सबसे बड़ी ताकत Global Capability Centres (GCCs) हैं। पहली छमाही में कुल ऑफिस लीजिंग का 45% हिस्सा इन्हीं सेंटर्स ने लिया है। अच्छी बात यह है कि अब केवल टेक कंपनियां ही नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और बैंकिंग सेक्टर की कंपनियां भी बड़ी मात्रा में जगह ले रही हैं, जिससे मार्केट में विविधीकरण बढ़ा है।
ESG का महत्व
अब ऑफिस स्पेस के लिए 'ग्रीन-सर्टिफिकेशन' अनिवार्य सा हो गया है। नई बनकर तैयार हुई इमारतों में से 76% ग्रीन-सर्टिफाइड हैं और कुल लीजिंग का 73% हिस्सा इन्हीं इमारतों में हुआ है। पुरानी इमारतें जो ESG मानकों को पूरा नहीं कर पा रही हैं, उनके लिए अब टॉप-टियर किरायेदार ढूंढना मुश्किल हो सकता है।
निवेशकों के लिए जोखिम
भले ही बाजार अभी मालिकों के पक्ष में है, लेकिन ग्लोबल इकोनॉमिक हालात और GCCs की विस्तार योजनाओं पर नजर रखना जरूरी है। इसके अलावा, स्टील और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण कंस्ट्रक्शन में देरी का रिस्क भी बना हुआ है, जो भविष्य के प्रोजेक्ट्स पर असर डाल सकता है।
