भारत में कॉर्पोरेट ऑफिस लीजिंग का ट्रेंड बदल रहा है। अब कंपनियां सिर्फ सस्ते किराए के बजाय मेट्रो कनेक्टिविटी और बेहतर एयर क्वालिटी को प्राथमिकता दे रही हैं। एक सर्वे के मुताबिक **50%** ऑक्यूपायर्स खराब हवा को बड़ा जोखिम मानते हैं, जबकि **18%** कंपनियां ट्रांजिट-फ्रेंडली लोकेशन के लिए ज्यादा किराया देने को तैयार हैं।
भारत में ऑफिस स्पेस चुनने का तरीका बदल रहा है। अब पारंपरिक फैक्टर जैसे कम किराया या नामी बिजनेस एड्रेस ही सब कुछ नहीं रह गए हैं। कंपनियां अब इस बात पर अधिक ध्यान दे रही हैं कि कर्मचारी ऑफिस तक कितनी आसानी से पहुंच सकते हैं और वहां का वातावरण कैसा है।
हालिया डेटा के अनुसार, 50% ऑफिस ऑक्यूपायर्स खराब एयर क्वालिटी को बिजनेस ऑपरेशंस और कर्मचारियों की सेहत के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। इसके अलावा, 18% कंपनियां ऐसी जगहों के लिए प्रीमियम किराया देने को भी तैयार हैं, जो मेट्रो स्टेशनों जैसे बड़े पब्लिक ट्रांसपोर्ट हब के पास स्थित हैं। इससे साफ है कि कमर्शियल प्रॉपर्टी की वैल्यू अब उसकी सुलभता (Accessibility) और आसपास के माहौल से तय हो रही है।
इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से बदलेगी तस्वीर
यह बदलाव सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च से सीधे जुड़ा है। आने वाले सालों में बड़े ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट्स तय करेंगे कि किस इलाके में ऑफिस की मांग ज्यादा होगी। मुंबई में मेट्रो लाइन 2B, 4 और 6 के पूरा होने से वर्ली, बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स और पवई जैसे इलाकों में कमर्शियल स्पेस की डिमांड बढ़ेगी। वहीं, दिल्ली-एनसीआर की गोल्डन लाइन और जेवर एयरपोर्ट के आसपास का विकास भी कंपनियों को आकर्षित कर रहा है।
यह ट्रेंड सिर्फ बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है। चेन्नई में छह-लेन वाली पेरिफेरल रिंग रोड नए ऑफिस क्लस्टर्स को प्रतिस्पर्धी बनाएगी, जबकि पुणे में एयरपोर्ट का विस्तार एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर कर रहा है, जिससे टेक्नोलॉजी फर्मों की दिलचस्पी बढ़ रही है।
रियल एस्टेट इन्वेस्टर्स के लिए क्या है संकेत?
इन्वेस्टर्स और डेवलपर्स के लिए बाजार में एक स्पष्ट विभाजन दिख रहा है। जो बिल्डिंग्स पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ी हैं और बेहतर एयर क्वालिटी देती हैं, उनका किराया और ऑक्यूपेंसी रेट बेहतर रहेगा। इसके उलट, बिना ट्रांजिट लिंक या प्रदूषित इलाकों में स्थित पुरानी प्रॉपर्टीज पर दबाव बढ़ सकता है।
इन्वेस्टर्स को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ये बदलाव सरकारी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स के पूरा होने की टाइमलाइन पर निर्भर करते हैं। यदि मेट्रो या एक्सप्रेसवे के काम में देरी होती है, तो डिमांड भी प्रभावित हो सकती है। फिलहाल, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप प्रमुख ट्रांजिट प्रोजेक्ट्स की डेडलाइन पर नजर रखें और देखें कि कैसे बेहतर कनेक्टिविटी वाली संपत्तियों का रेंटल यील्ड (Rental Yield) अन्य इलाकों से बेहतर प्रदर्शन करता है।
