भारत के इंडस्ट्रियल रीयल एस्टेट सेक्टर में घरेलू कंपनियां ग्लोबल फर्म्स को पीछे छोड़ रही हैं। 2021 से लीजिंग वॉल्यूम में **49%** की सालाना दर (CAGR) से ग्रोथ देखी गई है, जो सरकारी योजनाओं और टियर-2 शहरों में विस्तार का नतीजा है।
बाजार में बड़ा बदलाव
भारत का इंडस्ट्रियल रीयल एस्टेट परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अब तक ग्लोबल कंपनियां ऑफिस स्पेस के लिए जानी जाती थीं, लेकिन अब लोकल मैन्युफैक्चरर्स फैक्ट्री और वेयरहाउस इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग में सबसे आगे हैं। 2026 के मध्य तक, कुल मैन्युफैक्चरिंग लीजिंग 69 मिलियन स्क्वायर फीट तक पहुंच गई है, जो 49% की शानदार सालाना ग्रोथ रेट को दर्शाता है।
ग्रेड-ए प्रॉपर्टीज की डिमांड
यह ट्रेंड केवल जगह की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपनियों के काम करने के तरीके में बदलाव को भी दिखाता है। नई मैन्युफैक्चरिंग लीज में 90% हिस्सेदारी अकेले 'ग्रेड-ए' प्रॉपर्टीज की है। ये आधुनिक फैसिलिटीज ऑटोमेशन और जटिल प्रोडक्शन लाइन्स को सपोर्ट करती हैं, जिससे कंपनियां अपनी कैपेसिटी को और बेहतर बना रही हैं।
सरकारी स्कीम और नए हब
इस ग्रोथ के पीछे सरकारी PLI स्कीम का बड़ा हाथ है, जिसके तहत 14 अलग-अलग सेक्टर्स में 800 से ज्यादा आवेदन आए हैं। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़ी कंपनियां अब इंदौर, कोयंबटूर और नागपुर जैसे टियर-2 शहरों की ओर रुख कर रही हैं, जहां जमीन आसानी से और कम लागत पर उपलब्ध है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इतनी ग्रोथ के बावजूद, निवेशकों को सावधानी बरतनी चाहिए। ग्लोबल एनर्जी मार्केट में अस्थिरता और कच्चे माल (Raw Material) की कीमतों में उतार-चढ़ाव मार्जिन को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा, रीयल एस्टेट में रेगुलेटरी मंजूरी में देरी या सप्लाई चेन में रुकावटें भविष्य के प्रोजेक्ट्स के लिए रिस्क पैदा कर सकती हैं। निवेशकों को इंडस्ट्रियल डेवलपर्स के नतीजों पर नज़र रखनी चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि ये लागत कारक बिजनेस पर कितना असर डाल रहे हैं।
