भारत में मॉल डेवलपर्स अब पारंपरिक एंकर स्टोर्स से हटकर बड़े और एक्सपीरियंस-बेस्ड रिटेल स्पेस पर दांव लगा रहे हैं। साल 2030 तक **40.4 मिलियन स्क्वायर फीट** की नई सप्लाई आने की उम्मीद है, लेकिन गुरुग्राम जैसे शहरों में बढ़ती खाली जगह चिंता का विषय बनी हुई है।
भारत का रिटेल रियल एस्टेट एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। अब मॉल सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं, बल्कि एंटरटेनमेंट और वेलनेस डेस्टिनेशन बन रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल मॉल सप्लाई साल 2030 तक 154.7 मिलियन स्क्वायर फीट तक पहुंच जाएगी।
बड़े साइज और नए ट्रेंड्स
नए बनने वाले मॉल्स का औसत साइज 0.59 मिलियन स्क्वायर फीट होने वाला है, जो 2000 के दशक से पहले के 0.25 मिलियन स्क्वायर फीट के औसत से कहीं ज्यादा है। CRE Matrix की रिपोर्ट बताती है कि नई लीजिंग एक्टिविटी में 72% हिस्सेदारी अब केवल एक्सपीरियंस-बेस्ड कैटेगरीज की है। वहीं, पारंपरिक एंकर स्टोर्स की मांग जो पहले 31% हुआ करती थी, अब गिरकर 11% पर आ गई है।
सप्लाई का जोखिम और लोकेशन का खेल
आने वाले समय में 51% नई सप्लाई सिर्फ हैदराबाद और गुरुग्राम जैसे दो बड़े मार्केट्स में केंद्रित है। यह ओवरसप्लाई और रेंटल प्रेशर का बड़ा खतरा पैदा करता है। अगर वर्तमान स्थिति देखें, तो ठाणे में वैकेंसी महज 1% है, जबकि गुरुग्राम में यह 13.6% तक पहुंच गई है, जो साफ दर्शाता है कि मॉल की सफलता उसकी लोकेशन पर निर्भर करती है।
लीजिंग डायनामिक्स में बदलाव
कंपटीशन बढ़ने के कारण औसत लीज टेन्योर घटकर 70 महीने (2026 की शुरुआत) रह गया है, जो 2021 में 75 महीने था। स्थिरता बनाए रखने के लिए डेवलपर्स अब लॉकडाउन पीरियड को बढ़ाकर 28.6 महीने तक ले गए हैं।
निवेशकों के लिए सलाह: रिटेल सेक्टर में पैसा लगाने वालों को अब मॉल्स के ऑक्यूपेंसी रेट्स और टेनेंट मिक्स पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। जो डेवलपर्स लीजर और रिटेल के सही तालमेल को नहीं समझ पाएंगे, उनके लिए रेवेन्यू बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। साथ ही, इन बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) कंपनी के डेट लेवल को कैसे प्रभावित करेगा, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा।
