वैल्यूएशन का बड़ा झटका
अब तक जमीन मालिक यह उम्मीद करते थे कि जब वे अपनी बनाई हुई यूनिट्स बेचेंगे, तब उन पर कैपिटल गेन टैक्स लगेगा। लेकिन नए नियमों के तहत, जैसे ही प्रोजेक्ट का कंप्लीशन सर्टिफिकेट (Completion Certificate) जारी होता है, उसे आय का एक निश्चित मूल्य मान लिया जाएगा और जमीन मालिकों को उस पर कैपिटल गेन टैक्स देना होगा। यानी, हाथ में पैसा आने से पहले ही टैक्स का बोझ आ जाएगा। ऐसे में, जमीन मालिकों को लंबे समय तक प्रॉपर्टी होल्ड करने की अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है और तुरंत कैश फ्लो की प्लानिंग करनी होगी।
12.5% टैक्स का सीधा असर
लंबे समय से रखी गई प्रॉपर्टी पर अब इंडेक्सेशन (Indexation) का फायदा नहीं मिलेगा और फ्लैट 12.5% की दर से टैक्स लगेगा। यह पुराने नियमों के मुकाबले टैक्स के बोझ को काफी बढ़ा देता है, खासकर उन जमीन मालिकों के लिए जिन्होंने प्रॉपर्टी कई दशकों से रखी हुई है। मुंबई या बेंगलुरु जैसे हाई-एप्रिसिएशन वाले शहरों में यह नियम और भी ज्यादा चुभेगा, जहां प्रॉपर्टी की मौजूदा स्टैंप ड्यूटी वैल्यू और पुरानी खरीद कीमत में बड़ा अंतर है।
स्ट्रक्चरल रिस्क और लिक्विडिटी का गैप
सेक्शन 54EC और 54F जैसे टैक्स छूट के नियमों पर बहुत सावधानी से भरोसा करना होगा। ये नियम कुछ खास शर्तों के साथ आते हैं। अगर कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी होने के 6 महीने के अंदर उस पैसे को कहीं और री-इन्वेस्ट नहीं किया गया, तो अचानक टैक्स का बड़ा बिल सामने आ सकता है, जो जमीन मालिक की तुरंत की कैश क्षमता से कहीं ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा, टैक्स कैलकुलेशन के लिए स्टाम्प ड्यूटी वैल्यू की जगह कंस्ट्रक्शन कॉस्ट को आधार मानने को लेकर भी टैक्स अधिकारियों के साथ विवाद की स्थिति बन सकती है। गलत कैलकुलेशन पर तुरंत टैक्स भरने के साथ-साथ प्रॉपर्टी टाइटल फ्रीज होने का खतरा भी रहता है।
भविष्य का अनुमान और सेक्टर पर असर
जमीन मालिकों और डेवलपर्स के बीच नए JDA साइनिंग में कमी आ सकती है, क्योंकि दोनों पक्ष अब इन टैक्स की वजह से बढ़ी हुई लिक्विडिटी की मांग को ध्यान में रखकर ही कॉन्ट्रैक्ट्स पर विचार करेंगे। बड़े और संस्थागत डेवलपर्स के पास एक फायदा होगा, क्योंकि वे एस्क्रो अकाउंट (Escrow Account) जैसी सुविधाएं देकर या आर्थिक मदद करके जमीन मालिकों को टैक्स चुकाने में मदद कर सकते हैं। वहीं, छोटे डेवलपर्स को जमीन हासिल करने में मुश्किल हो सकती है। जमीन मालिक अब ऐसे डील्स को प्राथमिकता देंगे जिनमें तुरंत कैश लिक्विडिटी मिले। प्रॉपर्टी के सेकेंडरी मार्केट में भी बिकने वाली यूनिट्स की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि मूल जमीन मालिक प्रोजेक्ट पूरा होते ही अपनी यूनिट्स बेचकर लिक्विडिटी वापस पाना चाहेंगे।
