भारत के सात राज्यों ने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) को आकर्षित करने के लिए खास पॉलिसीज़ लॉन्च की हैं। लक्ष्य है 2031 तक 1,380 नए GCCs स्थापित करना और 12 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देना। इस पॉलिसी से आने वाले दशक में ग्रेड A कमर्शियल ऑफिस स्पेस की डिमांड ज़बरदस्त बढ़ने की उम्मीद है।
भारत में बढ़ेंगे ग्लोबल सेंटर्स, नौकरियों की बहार!
भारत के सात राज्यों ने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) को लुभाने के लिए नई और खास पॉलिसीज़ तैयार की हैं। इन राज्यों का लक्ष्य है कि साल 2031 तक देश में 1,380 नए GCCs खुलें। इस बड़ी पहल से लगभग 12 लाख नई नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। CBRE की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कदम भारत की इकोनॉमी और कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
कौन से राज्य आगे?
इस विस्तार में कर्नाटक और महाराष्ट्र सबसे आगे हैं। कर्नाटक ने 500 नए GCCs स्थापित करने का लक्ष्य रखा है, जिससे करीब 3.5 लाख नौकरियां मिलेंगी। वहीं, महाराष्ट्र 200 GCCs का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जिससे 4 लाख लोगों को रोज़गार मिल सकता है।
इसके अलावा, राजस्थान 200 से ज़्यादा और गुजरात 250 से ज़्यादा GCCs को आकर्षित करने की तैयारी में हैं। केरल 80, हरियाणा 100, और मध्य प्रदेश 50 GCCs का टारगेट लेकर चल रहे हैं। यह दर्शाता है कि राज्य सरकारें मिलकर ग्लोबल कंपनियों के लिए रिसर्च, डेवलपमेंट और ऑपरेशन हब स्थापित करने के लिए बेहतर माहौल बना रही हैं।
रियल एस्टेट पर क्या होगा असर?
GCCs की बढ़ती संख्या कमर्शियल रियल एस्टेट की मांग को सीधे तौर पर बढ़ाएगी। इन सेंटर्स को बड़े, हाई-क्वालिटी ग्रेड A ऑफिस स्पेस की ज़रूरत होती है, जिनमें मॉडर्न इंफ्रास्ट्रक्चर हो। रियल एस्टेट डेवलपर्स और ऑफिस स्पेस प्रोवाइडर्स के लिए, यह एक्सपेंशन लीजिंग एक्टिविटी को बढ़ा सकता है और ऑफिस की खाली पड़ी जगहों (vacancy rates) को कम कर सकता है। REITs (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) और बड़े कमर्शियल प्रॉपर्टी डेवलपर्स को तब फायदा होता है जब मल्टीनेशनल कंपनियां भारत में अपना कारोबार बढ़ाती हैं, क्योंकि लंबे समय के लीज एग्रीमेंट्स से स्थिर रेंटल इनकम मिलती है।
निवेशकों के लिए जोखिम?
हालांकि, इन बड़े लक्ष्यों के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। इस पूरी पहल की सफलता राज्य सरकार की पॉलिसी पर निर्भर करती है। अगर सरकारी नीतियों में बदलाव होता है या इंसेंटिव स्ट्रक्चर में कोई गड़बड़ होती है, तो GCCs की स्थापना में देरी हो सकती है। इसके अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट भी तेज़ी से होना चाहिए। पब्लिक ट्रांसपोर्ट, रोड कनेक्टिविटी या बिजली सप्लाई में किसी भी तरह की देरी कंपनियों के लिए परेशानी का सबब बन सकती है।
सबसे बड़ा चैलेंज स्किल्ड टैलेंट को लेकर है। राज्यों की कोशिशों के बावजूद, यह देखना होगा कि वे ज़रूरी वर्कफोर्स तैयार कर पाते हैं या नहीं। निवेशकों को कमर्शियल लीजिंग वॉल्यूम, ऑफिस वैकैंसी रेट्स और सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर नज़र रखनी चाहिए। यह जानना भी ज़रूरी होगा कि कंपनियां प्लान से कितनी जल्दी ऑफिस ऑक्यूपाई करती हैं, ताकि इन पॉलिसीज़ का असली असर समझा जा सके।
