भारत का सीनियर लिविंग सेक्टर अब एक नेशनल पॉलिसी की मांग कर रहा है। साल **2046** तक **20 लाख** घरों की डिमांड के मुकाबले फिलहाल सिर्फ **25,000** यूनिट्स उपलब्ध हैं, जिससे बाजार में भारी सप्लाई-डिमांड गैप बना हुआ है।
भारत में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को देखते हुए 'सीनियर लिविंग' सेक्टर अब एक व्यवस्थित ढांचे की मांग कर रहा है। वर्तमान में सेक्टर की सबसे बड़ी समस्या राज्य-स्तरीय नियमों का बिखराव है, जिससे काम करने में बाधा आ रही है। Association of Senior Living India (ASLI) का मानना है कि एक केंद्रीय नीति न होने से प्रोजेक्ट्स को स्केल करना मुश्किल हो गया है।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
Ashiana Housing जैसे बड़े नाम इस सेक्टर में निवेश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें लैंड यूज, टैक्स और GST के मोर्चे पर काफी अस्पष्टता का सामना करना पड़ता है। अगर सरकार की ओर से स्पष्ट गाइडलाइंस आती हैं, तो सेक्टर में इंस्टीट्यूशनल फंडिंग और कैपिटल का फ्लो बढ़ सकता है।
रिवर्स मॉर्गेज और केयरगिवर का संकट
इस सेक्टर का एक बड़ा फोकस 'रिवर्स मॉर्गेज' फ्रेमवर्क में सुधार पर है। फिलहाल नियमों की जटिलता और कम वैल्यूएशन के कारण सीनियर सिटिजन्स घर की वैल्यू का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। इसके अलावा, सेक्टर में ट्रेनड केयरगिवर्स की भारी कमी है। इसे हल करने के लिए NITI Aayog ने 'National Caregiving Council' बनाने का सुझाव दिया है, जिससे केयरगिवर्स को सर्टिफिकेशन और सम्मान मिल सके।
जैसे-जैसे साल 2046 तक बुजुर्गों की संख्या 35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, इस सेक्टर की ग्रोथ पोटेंशियल काफी बड़ी है, बशर्ते पॉलिसी और लेबर की बाधाएं समय रहते दूर हो जाएं।
