भारत का रिटेल रियल एस्टेट सेक्टर अब बड़े और एक्सपीरियंस-बेस्ड मॉल्स की तरफ बढ़ रहा है। साल 2030 तक **40.4 मिलियन स्क्वायर फीट** की नई सप्लाई आने की उम्मीद है। इस बदलाव से प्राइम लोकेशंस और ओवर-सप्लाई वाले इलाकों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल सकता है।
भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट में बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव हो रहा है। डेवलपर्स अब छोटे प्रोजेक्ट्स के बजाय बड़े, एक्सपीरियंस-बेस्ड मॉल्स पर ध्यान दे रहे हैं ताकि फुटफॉल बढ़ाया जा सके और लंबे समय के लिए टेनेंट्स को जोड़ा जा सके। साल 2026 से 2030 के बीच, नए मॉल्स का औसत आकार 0.59 मिलियन स्क्वायर फीट रहने का अनुमान है, जो साल 2000 से पहले के 0.25 मिलियन स्क्वायर फीट की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है। निवेशकों के लिए यह 'ग्रेड-ए' एसेट्स की तरफ एक बड़ा शिफ्ट है।
मुंबई और बेंगलुरु बने लीडर
देशभर में रेंटल परफॉर्मेंस का अंतर साफ दिख रहा है। मुंबई और बेंगलुरु में मॉल्स का किराया पिछले तीन सालों में 22% बढ़ा है, जो 11% के नेशनल एवरेज से कहीं ज्यादा है। हालांकि, यह चमक हर जगह नहीं है। ठाणे जैसे इलाकों में वैकेंसी रेट महज 1.0% है, जबकि गुरुग्राम में यह 13.6% तक पहुंच गई है। स्पष्ट है कि सिर्फ निर्माण ही काफी नहीं है, लोकेशन की गुणवत्ता ही रेवेन्यू तय करेगी।
ऑफिस-लिंक्ड रिटेल और सप्लाई का रिस्क
अब ऑफिस के साथ रिटेल स्पेस को जोड़ने का चलन जोर पकड़ रहा है, जिसका कुल स्टॉक 51.7 मिलियन स्क्वायर फीट तक पहुंच गया है। लेकिन, 2030 तक आने वाली 40.4 मिलियन स्क्वायर फीट की नई सप्लाई के कारण ओवर-सप्लाई का रिस्क भी बना हुआ है। यदि डिमांड सप्लाई के साथ नहीं चली, तो कमजोर एसेट्स वाले डेवलपर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव आ सकता है।
निवेशकों के लिए जरूरी बातें
इन्वेस्टर्स को मुख्य रूप से नए मेगा-मॉल्स के 'ऑक्यूपेंसी लेवल' पर नजर रखनी चाहिए। खाली स्पेस सीधे कैश फ्लो को चोट पहुंचाता है। इसके अलावा, माइक्रो-मार्केट के रेंटल ट्रेंड्स और डेवलपर्स का डेट लेवल (कर्ज का स्तर) ट्रैक करना भी जरूरी है, क्योंकि बड़ी पूंजी वाले इन प्रोजेक्ट्स में फाइनेंसिंग कॉस्ट का काफी असर पड़ता है।
