Q3 2026 में भारत की रिटेल लीजिंग एक्टिविटी **7.3%** घटकर **2.22 मिलियन स्क्वायर फीट** पर आ गई है। ग्रेड-ए मॉल्स की कमी के चलते अब रिटेलर्स हाई-स्ट्रीट लोकेशन्स की ओर रुख कर रहे हैं, जहां वैकेंसी रेट घटकर **4.8%** रह गई है।
रिटेल सेक्टर में बदलाव का दौर
भारतीय रिटेल रियल एस्टेट मार्केट में तीसरी तिमाही के दौरान लीजिंग गतिविधियों में सुस्ती देखी गई है। कुल ट्रांजैक्शन वॉल्यूम पिछले क्वार्टर के मुकाबले 7.3% गिरकर 2.22 मिलियन स्क्वायर फीट रह गया है। इस गिरावट की मुख्य वजह नए ग्रेड-ए मॉल्स की भारी कमी है, जो लगातार तीन तिमाहियों से बनी हुई है।
हाई-स्ट्रीट की ओर बढ़ा झुकाव
बड़े डेवलपर्स नए प्रोजेक्ट्स पूरे करने में जूझ रहे हैं, जिसका सीधा असर रिटेल ब्रांड्स की एक्सपेंशन स्ट्रैटेजी पर पड़ा है। अब रिटेलर्स मॉल्स का इंतजार करने के बजाय हाई-स्ट्रीट लोकेशन्स को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो कुल लीजिंग ट्रांजैक्शंस का 67.9% हिस्सा है। इस बदलाव ने प्राइम मॉल्स में वैकेंसी लेवल को घटाकर 4.8% कर दिया है, जिससे ब्रांड्स के लिए विस्तार के विकल्प सीमित हो गए हैं।
घरेलू रिटेलर्स का दबदबा
इस तिमाही में कुल लीजिंग में 86.3% हिस्सेदारी घरेलू रिटेलर्स की रही है। फूड, फैशन और लाइफस्टाइल सेगमेंट में काम करने वाली ये कंपनियां हाई-स्ट्रीट प्रॉपर्टीज को चुन रही हैं। मुंबई और दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े शहरों में रेंटल प्राइसेज में 2.1% की तिमाही वृद्धि दर्ज की गई है, क्योंकि सीमित जगह के बावजूद डिमांड काफी ज्यादा है।
आने वाले समय की तस्वीर
हालांकि बाजार में अभी सप्लाई की किल्लत है, लेकिन 2028 तक 12.7 मिलियन स्क्वायर फीट ग्रेड-ए मॉल स्पेस तैयार होने की उम्मीद है। यह नई इन्वेंट्री मुख्य रूप से दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बाजारों में केंद्रित है। निवेशकों के लिए असली चुनौती इन प्रोजेक्ट्स की समय पर डिलीवरी है; यदि इसमें देरी होती है, तो हाई-स्ट्रीट रेंट में तेजी जारी रह सकती है और बड़े रिटेलर्स का विस्तार रुक सकता है।
