इंडिया का रिटेल मार्केट: नया दौर, नई राहें
इंडिया के रिटेल प्रॉपर्टी मार्केट में बड़ा बदलाव आया है। 2025 की दूसरी छमाही में, देश के सात बड़े शहरों में 43 लाख वर्ग फुट (4.3 million sq ft) से ज्यादा जगह की लीजिंग हुई। ये आंकड़े बताते हैं कि फिजिकल स्टोर्स की अहमियत कम नहीं हुई है, बस उनका फोकस बदल गया है। हाई स्ट्रीट प्रॉपर्टीज़, यानी मेन सड़कों पर स्थित दुकानें, शॉपिंग मॉल्स की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से रेंट में बढ़ोतरी और ब्रांड्स का आकर्षण हासिल कर रही हैं।
'एक्सपीरियंस' पर दांव, ई-कॉमर्स को टक्कर
रिटेलर्स अब सिर्फ 'खरीद-फरोख्त' (transactions) से आगे बढ़कर ग्राहकों को खास 'एक्सपीरियंस' देने पर ज़ोर दे रहे हैं। ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते दबाव को झेलने के लिए, फिजिकल स्टोर्स को ऐसी जगहें बनना होगा जहां लोग समय बिता सकें, एक्टिविटीज कर सकें और कुछ अनोखा महसूस कर सकें। अपैरल, एंटरटेनमेंट और फूड एंड बेवरेज (F&B) सेक्टर्स इस बदलाव को लीड कर रहे हैं। ब्रांड्स 1,000 से 5,000 वर्ग फुट तक की मीडियम साइज़ की दुकानों को किराए पर लेना पसंद कर रहे हैं, ताकि विजिबिलिटी, रेंट और फ्लेक्सिबिलिटी का सही बैलेंस बना रहे।
हाई स्ट्रीट: ब्रांड्स की पहली पसंद
हाई स्ट्रीट प्रॉपर्टीज़ आज ब्रांड्स की पहली पसंद बनती जा रही हैं। इनकी अच्छी विजिबिलिटी, लगातार आने वाले ग्राहक (foot traffic) और लोकल इलाकों में फिट होने की क्षमता इन्हें मॉल्स से बेहतर बनाती है। फैशन, लग्जरी और फूड एंड ड्रिंक सेक्टर के ब्रांड्स विस्तार के लिए इन्हें चुन रहे हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट और पार्किंग जैसी सुविधाएं भी इन्हें और आकर्षक बनाती हैं। खास बात यह है कि हाई स्ट्रीट पर किराये में भी अच्छी-खासी बढ़ोतरी देखी जा रही है।
मॉल्स का भविष्य: 'एक्सपीरियंस' ही समाधान
दूसरी ओर, मॉल्स को अपनी जगह बनाए रखने के लिए 'एक्सपीरियंस' पर फोकस करना होगा। ग्रेड A मॉल्स को छोड़कर, पुराने मॉल्स में खाली पड़ी जगहों (vacancies) की संख्या बढ़ रही है, और लगभग 20% मॉल्स तो 'घोस्ट मॉल्स' में तब्दील हो चुके हैं। कामयाब हो रहे मॉल्स अब सिर्फ शॉपिंग सेंटर नहीं, बल्कि एंटरटेनमेंट, डाइनिंग और हॉस्पिटैलिटी के हब बन रहे हैं। डेवलपर्स भी अब रिटेल को रेसिडेंशियल और एंटरटेनमेंट के साथ जोड़कर मिक्स्ड-यूज़ प्रोजेक्ट्स बना रहे हैं।
नई सप्लाई और इकोनॉमिक बूस्टर
आने वाले समय में रिटेल स्पेस की नई सप्लाई का करीब 70% हिस्सा दिल्ली NCR और हैदराबाद में केंद्रित होगा। यह इन शहरों में मजबूत कंज्यूमर स्पेंडिंग, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और नए मिक्स्ड-यूज़ डेवलपमेंट से जुड़ा है। देश की मजबूत इकोनॉमी, बढ़ती आय और मिडिल क्लास की वजह से, नॉन-एसेंशियल आइटम्स पर कंज्यूमर स्पेंडिंग बढ़ी है। साल 2024 तक क्रेडिट कार्ड स्पेंडिंग में तीन गुना की वृद्धि देखी गई थी, जो कंज्यूमर के खर्च करने की क्षमता को दर्शाता है।
चुनौतियां और उम्मीदें
बाजार में टॉप हाई स्ट्रीट/मॉल्स और पुराने रिटेल प्रॉपर्टीज़ के बीच परफॉर्मेंस का गैप एक बड़ी चुनौती है। पुराने मॉल्स को अपडेट करना मुश्किल हो सकता है। ई-कॉमर्स, जिसके 2030 तक 170-190 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, फिजिकल रिटेल इनोवेशन को बढ़ावा दे रहा है, लेकिन पुरानी प्रॉपर्टीज़ पर दबाव भी बढ़ा रहा है। साल 2026 में महंगाई और स्थिर वेतन के कारण कंज्यूमर स्पेंडिंग धीमी पड़ सकती है। साथ ही, कुछ इलाकों में बड़ी मात्रा में नई सप्लाई अगर डिमांड के अनुरूप न हो, तो दिक्कतें पैदा कर सकती हैं। ऐसे में, भविष्य की सफलता 'एक्सपीरियंस-ड्रिवन' और यूनीक फिजिकल स्पेस बनाने पर ही टिकी होगी।