ऑफिस मार्केट में रिकॉर्डतोड़ तेजी
2026 की पहली तिमाही (Q1) भारत के रियल एस्टेट सेक्टर के लिए खासी अहम रही। कमर्शियल ऑफिस स्पेस की लीजिंग (leasing) ने नए कीर्तिमान स्थापित किए और किराए में भी बढ़ोतरी देखी गई। इस दौरान, टॉप 8 शहरों में कुल 29.9 मिलियन वर्ग फुट की लीजिंग हुई, जो पिछले साल की इसी तिमाही से 6% ज़्यादा है। यह उछाल सिर्फ बेंगलुरु जैसे शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) और हैदराबाद ने तो अपने अब तक के सबसे अच्छे तिमाही नतीजे पेश किए।
इस तेजी के पीछे ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) सबसे बड़े चालक रहे, जिन्होंने 14.4 मिलियन वर्ग फुट की जगह लीज पर ली। इसके अलावा, किराए में 2% से लेकर 15% तक की शानदार बढ़ोतरी देखने को मिली। खास तौर पर, NCR और कोलकाता में किराए 15% बढ़े। NCR और बेंगलुरु जैसे शहरों में औसत किराया पहली बार ₹100 प्रति वर्ग फुट के पार चला गया। कुल ऑफिस लीजिंग (ग्रॉस एब्जॉर्प्शन) 10% बढ़कर 18.9 मिलियन वर्ग फुट रही, जिसमें 100,000 वर्ग फुट से बड़े सौदों का हिस्सा 47% रहा। निवेशकों ने भी ऑफिस प्रॉपर्टीज़ में $2.4 बिलियन का बड़ा निवेश किया।
घरों की बिक्री में गिरावट, खरीदार ₹1 करोड़ से ऊपर के घरों को दे रहे तरजीह
इसके उलट, आवासीय (residential) यानी घरों के बाजार में चुनौती बनी हुई है। टॉप 8 शहरों में घरों की बिक्री 4% घटकर 84,827 यूनिट पर आ गई। मुंबई में बिक्री 7%, NCR में 11% और पुणे में 11% तक गिरी। हालांकि, यह देखना दिलचस्प है कि खरीदार अब ऊंची कीमत वाले घरों की ओर बढ़ रहे हैं। ₹1 करोड़ से ज़्यादा के घरों की बिक्री में 11% की बढ़ोतरी हुई। ₹1-2 करोड़ का प्राइस सेगमेंट अब कुल बिक्री का 29% हिस्सा बन गया है। यह ट्रेंड पहले भी देखा गया था, जहां ₹1 करोड़ और उससे ज़्यादा के घरों की हिस्सेदारी बढ़कर 62% (पिछले साल 51%) हो गई थी। वहीं, ₹1 करोड़ से कम कीमत वाले घरों की बिक्री में गिरावट आई, जिसमें ₹50 लाख से कम के सेगमेंट में 23% और ₹50 लाख से ₹1 करोड़ के बीच 12% की गिरावट दर्ज की गई।
बढ़ता हुआ इन्वेंटरी (Unsold Inventory) और डेवलपर्स पर दबाव
यह मिला-जुला बाजार तब सामने आया है जब बिके न हुए घरों (unsold inventory) का अंबार लगा हुआ है। 'बिकने में लगने वाले क्वार्टर' (Quarters to Sell - QTS) की संख्या थोड़ी बढ़कर 6.0 क्वार्टर हो गई है, जो पिछले साल 5.9 क्वार्टर थी। ₹1 करोड़ से ऊपर की कीमत वाली प्रॉपर्टीज़ में इन्वेंटरी 18% बढ़ी है। ₹2-5 करोड़ की रेंज में तो बिना बिकी यूनिट्स में 46% की भारी वृद्धि देखी गई।
मजबूत ऑफिस परफॉरमेंस के बावजूद निवेशक क्यों चिंतित?
ऑफिस लीजिंग में इतनी शानदार परफॉरमेंस के बावजूद, रियल एस्टेट कंपनियों के शेयरों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। Nifty Realty Index इस साल अब तक करीब 24% गिर चुका है, जो इसे सेक्टरों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला इंडेक्स बनाता है। यह गिरावट GDP ग्रोथ और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ब्याज दरों में कटौती (5.25%) जैसे सकारात्मक आर्थिक संकेतों के बावजूद आई है।
इस चिंता के कई कारण हैं। पहली, घरों की affordability (पहुंच) अभी भी एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि बिक्री धीमी है लेकिन कीमतें ज़्यादा हैं। दूसरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का IT सेक्टर पर संभावित असर, जो कि रियल एस्टेट के लिए एक अहम मांग का स्रोत है, निवेशकों के मन में अनिश्चितता पैदा कर रहा है। डेवलपर्स डिस्काउंट और स्पेशल पेमेंट स्कीम्स जैसे ऑफर दे रहे हैं, जो बताता है कि वे प्रॉपर्टीज़, खासकर महंगी वाली, बेचने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं।
बाजार की शंकाओं के बीच डेवलपर्स का वैल्यूएशन महंगा लग रहा है
मौजूदा बाजार की धारणाओं को देखते हुए, बड़े डेवलपर्स का शेयर वैल्यूएशन (valuation) महंगा दिखाई दे रहा है। उदाहरण के लिए, DLF का P/E रेश्यो लगभग 30.19 से 47.58 के बीच है, Godrej Properties का 27.54 से 31.6, Oberoi Realty का 22.7 से 30.2, और Prestige Estates Projects का 51.13 से 54.2 है। रियल एस्टेट शेयरों में गिरावट और IT सेक्टर की अनिश्चितता जैसे जोखिमों को देखते हुए, यह वैल्यूएशन गैप शायद लंबे समय तक टिकाऊ न हो।
निवेश जारी, लेकिन बाज़ार की भावना पिछड़ रही है
बाजार की मौजूदा अनिश्चितताओं के बावजूद, भारतीय रियल एस्टेट में संस्थागत निवेश (institutional investment) मज़बूत बना रहा। Q1 2026 में यह $1.41 बिलियन तक पहुंच गया, जो पिछले साल की इसी तिमाही से 74% ज़्यादा है। इसमें घरेलू पूंजी का योगदान 72% रहा। कमर्शियल प्रॉपर्टीज़ ने कुल निवेश का 80% हिस्सा आकर्षित किया, जिसका मुख्य कारण GCCs का विस्तार रहा। विश्लेषकों का मानना है कि 2026 में भी सेक्टर में वृद्धि जारी रहेगी, जिसमें जुए (speculation) के बजाय सावधानीपूर्वक विस्तार और प्रोजेक्ट पूरा करने पर ज़ोर दिया जाएगा। अनुकूल जनसांख्यिकी (demographics) और भारत की मज़बूत उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के कारण संस्थागत निवेश बना रहने की उम्मीद है। हालांकि, रियल एस्टेट शेयरों का लगातार खराब प्रदर्शन बताता है कि बाजार की भावना को सेक्टर की वास्तविक उपलब्धियों के बराबर आने के लिए महत्वपूर्ण सकारात्मक खबरों की ज़रूरत है।