भारत का रियल एस्टेट सेक्टर साल 2030 तक **$1 ट्रिलियन** के वैल्यूएशन तक पहुंचने की राह पर है। अनुमान है कि इस सेक्टर का जीडीपी (GDP) में योगदान बढ़कर **13%** तक पहुंच जाएगा, हालांकि निवेशकों की नजरें मॉर्गेज रेट्स और रॉ-मटेरियल की कीमतों पर टिकी हैं।
कोलकाता में आयोजित NATCON 2026 कन्वेंशन में CREDAI और ANAROCK Research ने एक बड़ा आंकड़ा साझा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर 2030 तक $1 ट्रिलियन और 2047 तक $5.8 ट्रिलियन के स्तर को छू सकता है।
सेक्टर में क्यों है इतना बड़ा बदलाव?
साल 2009 में अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी का कुल मूल्य $94 बिलियन था, जो 2025 में बढ़कर $503 बिलियन तक पहुंच गया है। इस तेजी के पीछे RERA और GST जैसे रिफॉर्म्स का बड़ा हाथ है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है और संस्थागत निवेश (Institutional Investment) में उछाल आया है।
सेल्स और डिमांड के आंकड़े
टॉप 7 शहरों में रेजिडेंशियल सेल्स वैल्यू पिछले 7 तिमाहियों से लगातार ₹1.3 लाख करोड़ के पार बनी हुई है। कमर्शियल स्पेस में भी रौनक है, जहां GCCs (Global Capability Centers) कुल ऑफिस लीजिंग का 45% हिस्सा कवर कर रहे हैं। साथ ही, REITs का बढ़ता दायरा इस स्थिरता को और मजबूती दे रहा है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
मार्केट का लॉन्ग-टर्म आउटलुक पॉजिटिव है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं:
- महंगाई और रेट्स: बढ़ती मॉर्गेज दरें और प्रॉपर्टी की कीमतें अफोर्डेबिलिटी पर दबाव डाल सकती हैं।
- इनपुट कॉस्ट: सीमेंट और स्टील की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे प्रोजेक्ट मार्जिन को प्रभावित करता है।
- अन्य अड़चनें: सरकारी मंजूरियों और जमीन अधिग्रहण की जटिल प्रक्रियाएं अक्सर प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बनती हैं।
भविष्य में ग्रोथ केवल बड़े मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहर भी फोकस में रहेंगे। इसके अलावा, डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स वेयरहाउसिंग और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर रियल एस्टेट के नए ग्रोथ पिलर बनकर उभर रहे हैं।
