भारतीय रियल एस्टेट में निवेश का ट्रेंड साफ बदलता हुआ दिख रहा है। अब विदेशी पूंजी के मुकाबले देसी निवेशकों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। Q1 2026 में कुल ₹1.6 अरब का इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट आया, जिसमें देसी पूंजी की हिस्सेदारी 75% तक पहुंच गई, जो कि पिछले 4-5 सालों में 20% से 50% के बीच रहती थी। यह दिखाता है कि भारतीय रियल एस्टेट अब अपनी ग्रोथ के लिए ज्यादा आत्मनिर्भर बन रहा है। हालांकि, इस देसी पूंजी पर अधिक निर्भरता कुछ जोखिम भी ला सकती है।
इसके उलट, विदेशी पूंजी (Foreign Capital) में 23% की बड़ी गिरावट आई है और यह घटकर $400 मिलियन रह गई है। ग्लोबल अनिश्चितताओं, जैसे कि व्यापार, तेल और कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव, के कारण विदेशी निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं।
सेगमेंट की बात करें तो, सबसे ज्यादा निवेश ऑफिस (Office) प्रॉपर्टीज में हुआ, जहां $800 मिलियन आए। इनमें 90% से ज़्यादा का योगदान देसी फंड्स का रहा। रेसिडेंशियल सेक्टर में $300 मिलियन, जबकि हॉस्पिटैलिटी, रिटेल और अन्य सेक्टर्स में कुल $350 मिलियन का निवेश आया। इन अन्य सेक्टर्स में विदेशी पूंजी की हिस्सेदारी 70% रही।
वैश्विक ब्याज दरें (Global Interest Rates) विदेशी निवेश को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं। भारत में RBI ने अपनी प्रमुख ब्याज दर 5.25% पर स्थिर रखी है। लेकिन, मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष और बढ़ती तेल की कीमतें, महंगाई को बढ़ा सकती हैं और ब्याज दरों में कटौती को रोक सकती हैं, जिससे ग्लोबल फंड्स के लिए निवेश कम आकर्षक हो सकता है।
एनालिस्ट्स का मानना है कि 2026 में भारतीय रियल एस्टेट में स्थिर ग्रोथ जारी रहेगी। दक्षिणी शहरों में ग्रोथ तेज रहने की उम्मीद है, जबकि NCR जैसे इलाकों को थोड़ा और समय लग सकता है। प्रॉपर्टी की कीमतें स्थिर रहेंगी, लेकिन बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद कम है।
बाजार के सामने सबसे बड़ा जोखिम देसी पूंजी पर बढ़ती निर्भरता है। साथ ही, FY27 तक अनसोल्ड स्टॉक 3.2-3.4 साल तक पहुंचने का अनुमान है, जो मांग में कमी आने पर कीमतों पर दबाव डाल सकता है। मिडिल ईस्ट से आने वाले NRI निवेश पर भी ग्लोबल अनिश्चितताओं का असर पड़ सकता है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत का रियल एस्टेट सेक्टर APAC रीजन में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखेगा। मजबूत कंज्यूमर डिमांड, अनुकूल डेमोग्राफिक्स और सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स इसे आगे बढ़ाएंगे।