रियल एस्टेट में 'आम' का संकट गहराया, लग्जरी घरों की पूछपरख बढ़ी!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
रियल एस्टेट में 'आम' का संकट गहराया, लग्जरी घरों की पूछपरख बढ़ी!
Overview

India Real Estate Market Q1 2026 में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, सस्ते घरों की बिक्री में **23%** की भारी गिरावट आई है, जबकि डेवलपर्स अब लग्जरी घरों की ओर बढ़ रहे हैं। इससे आम खरीदारों के लिए घर खरीदना और मुश्किल हो गया है।

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क्यों हो रहा है यह बदलाव?

रियल एस्टेट डेवलपर्स पर इन दिनों लागत का भारी दबाव है, खासकर जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में, ज्यादा प्रॉफिट (Profit) कमाने के लिए वे महंगे और लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर फोकस कर रहे हैं। इसकी वजह से हाई-एंड मार्केट तो चमक रहा है, लेकिन आम खरीदारों पर अफोर्डेबिलिटी (Affordability) का बोझ बढ़ रहा है। मार्केट अब साफ तौर पर बंट गया है, जहाँ अलग-अलग प्राइस सेगमेंट में अलग-अलग ट्रेंड्स देखे जा रहे हैं।

महंगे घरों की मांग में उछाल

नाइट फ्रैंक इंडिया (Knight Frank India) की रिपोर्ट बताती है कि 2026 की पहली तिमाही में ₹50 लाख से कम कीमत वाले घरों की बिक्री में 23% की जबरदस्त गिरावट आई। इन आठ प्रमुख शहरों में कुल 16,273 यूनिट्स ही बिक पाईं। यही हाल ₹50 लाख से ₹1 करोड़ के सेगमेंट का भी रहा, जहाँ 12% की कमी के साथ 23,567 यूनिट्स बिकीं। नतीजतन, 1 करोड़ रुपये से कम के घर अब कुल बिक्री का सिर्फ 47% रह गए हैं, जबकि पिछले साल यानी 2025 की पहली तिमाही में यह आंकड़ा 54% था।

दूसरी ओर, ₹1 से ₹2 करोड़ वाले सेगमेंट में 10% की ग्रोथ देखी गई। ₹2 से ₹5 करोड़ की रेंज में 17% का इजाफा हुआ, और तो और ₹20 से ₹50 करोड़ के सेगमेंट में तो बिक्री 80% तक उछल गई! कुल मिलाकर, सभी सेगमेंट को मिलाकर रियल एस्टेट में कुल बिक्री 4% गिरी है, जो 84,827 यूनिट्स रही। यह दिखाता है कि मार्केट प्रीमियम प्रॉपर्टीज की तरफ झुक रहा है, जिसे $5.1 बिलियन के रिकॉर्ड कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) का भी सहारा मिला है।

मार्केट के फैक्टर और डेवलपर्स की स्ट्रैटेजी

मौजूदा मार्केट की चाल कई फैक्टर्स से तय हो रही है। 2025 की पहली तिमाही में घरों की कुल बिक्री 12% गिरी थी, खासकर 1 करोड़ रुपये से कम के घरों की डिमांड धीमी पड़ गई थी। आज के समय में अफोर्डेबिलिटी (Affordability) एक बड़ी चिंता है, क्योंकि 2026 की पहली तिमाही में प्रमुख शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें पिछले साल की तुलना में 14.1% बढ़कर औसतन ₹14,633 प्रति वर्ग फुट हो गईं, जबकि डिमांड ग्रोथ में नरमी आई।

हालांकि, विश्लेषकों को अभी भी लॉन्ग-टर्म (Long-term) में अच्छी ग्रोथ की उम्मीद है, क्योंकि शहरीकरण (Urbanization) और बढ़ती आय (Income) डोमेस्टिक डिमांड को सपोर्ट कर रही है। सप्लाई (Supply) में भी बड़ा बदलाव आया है, 2026 की पहली तिमाही में नए लॉन्च 26% बढ़कर लगभग 1.26 लाख यूनिट्स तक पहुंच गए। लेकिन, नए लॉन्च बिक्री से ज्यादा रहे, जिससे इन्वेंटरी ओवरहैंग (Inventory Overhang) बढ़ा है। DLF और Lodha Developers जैसे बड़े डेवलपर्स की मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) और P/E रेश्यो (P/E Ratio) मजबूत बने हुए हैं (DLF का लगभग 33, Lodha का 25)। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की पॉलिसी की वजह से होम लोन की ब्याज दरें आम तौर पर 8-9% पर स्थिर हैं, जो महंगाई और ग्रोथ को संतुलित करके अफोर्डेबिलिटी में मदद करती हैं। फिर भी, कंस्ट्रक्शन मटेरियल और जमीन की बढ़ती लागत डेवलपर्स को प्रॉफिट बनाए रखने के लिए हाई-वैल्यू सेगमेंट की ओर धकेल रही है।

अफोर्डेबिलिटी का दबाव और ग्लोबल रिस्क

सस्ते घरों की बिक्री में आई यह भारी गिरावट कई लोगों के लिए अफोर्डेबिलिटी क्राइसिस (Affordability Crisis) का संकेत देती है। डेवलपर्स के लग्जरी प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देने से एंट्री-लेवल (Entry-level) घरों की उपलब्धता कम हो रही है, जिससे घरों की लागत और आय के बीच का अंतर बढ़ रहा है। प्रीमियम सेगमेंट फिलहाल स्थिर है, लेकिन आर्थिक मंदी या ब्याज दरों में बढ़ोतरी के प्रति यह ज्यादा संवेदनशील हो सकता है।

पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं (Geopolitical Uncertainties) के चलते सावधानी बरती जा रही है। इसने खरीदारों के सेंटिमेंट (Sentiment) को प्रभावित किया है और मध्य पूर्वी खरीदारों से निवेश को अस्थायी रूप से कम कर दिया है, जो भारतीय रियल एस्टेट के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऊंची तेल की कीमतें और कंस्ट्रक्शन की बढ़ी लागत, ग्लोबल टेंशन (Global Tensions) से और खराब होकर, डेवलपर्स पर दबाव डाल रही है और अंतिम कीमतों को प्रभावित कर रही है। 2026 की पहली तिमाही में टॉप शहरों में कुल हाउसिंग सेल्स में 7% की सीक्वेंशियल (Sequential) गिरावट देखी गई, हालांकि साल-दर-साल बिक्री में 9% की वृद्धि हुई। इन्वेंटरी लेवल भी 7% सालाना बढ़कर 6.01 लाख यूनिट्स से अधिक हो गए हैं, जिसका मतलब है कि सेल्स नए सप्लाई से पिछड़ सकती हैं, खासकर अगर अफोर्डेबल सेगमेंट में डिमांड कमजोर बनी रहती है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.