सुरक्षा के लिहाज से हुए हालिया हादसों के बाद, एक्सपर्ट्स ने भारत के स्टूडेंट हाउसिंग सेक्टर के लिए एक औपचारिक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की मांग की है। **4.3 करोड़** से ज्यादा छात्रों और सीमित संगठित सप्लाई के बीच, यह कदम बिल्डिंग कोड्स को लागू करने और संस्थागत निवेश (Institutional Capital) आकर्षित करने के लिए उठाया जा रहा है।
दिल्ली में हाल ही में हुई बिल्डिंग की दुर्घटना के बाद देश भर में स्टूडेंट हाउसिंग की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में 4.3 करोड़ से अधिक छात्र हैं, लेकिन फिलहाल 0.5% से भी कम छात्र संगठित या व्यवस्थित हॉस्टल में रह रहे हैं। ज्यादातर छात्र असुरक्षित पीजी (PG) या निजी हॉस्टलों में रहने को मजबूर हैं, जहां न तो फायर सेफ्टी के नियम हैं और न ही स्ट्रक्चरल मजबूती की कोई गारंटी।
क्यों जरूरी है नया नियम?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि स्टूडेंट हाउसिंग को एक अलग 'एसेट क्लास' के रूप में पहचान मिलनी चाहिए। अभी यह सेक्टर कानूनी तौर पर ग्रे एरिया में है। एक समर्पित कैटेगरी बनने से म्युनिसिपल लाइसेंसिंग और सेफ्टी सर्टिफिकेशन को अनिवार्य किया जा सकेगा।
निवेशकों के लिए क्या हैं मौके?
फिलहाल इस सेक्टर में बड़े निवेशकों का पैसा लगाना मुश्किल है क्योंकि लैंड कॉस्ट बहुत अधिक है। एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि अगर सरकार मास्टर प्लान में बदलाव करे और ट्रांजिट कॉरिडोर्स के पास Floor Area Ratio (FAR) को बढ़ाए, तो डेवलपर्स बेहतर और सुरक्षित हॉस्टल बना पाएंगे।
सरकार अब पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर भी विचार कर रही है ताकि इंफ्रास्ट्रक्चर पर बोझ डाले बिना छात्रों के लिए रहने की व्यवस्था सुधारी जा सके। अगर सरकारी स्तर पर रेगुलेटरी स्पष्टता आती है, तो यह अनऑर्गनाइज्ड मार्केट एक बड़े व्यवस्थित बिजनेस में बदल सकता है, जिस पर बड़े इंवेस्टर की नजरें टिकी हैं।
