India Offices: कार्बन उत्सर्जन में 55% तक की कटौती संभव, ग्रीन फिट-आउट्स का कमाल!

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Offices: कार्बन उत्सर्जन में 55% तक की कटौती संभव, ग्रीन फिट-आउट्स का कमाल!
Overview

Savills India की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का ऑफिस सेक्टर सर्कुलर फिट-आउट रणनीतियों (circular fit-out strategies) को अपनाकर अपने एम्बेडेड कार्बन उत्सर्जन (embodied carbon emissions) में 55% तक की भारी कटौती कर सकता है। यह तरीका मॉड्यूलर और दोबारा इस्तेमाल होने वाले डिज़ाइन पर जोर देता है, जिससे इंटीरियर इंस्टॉलेशन में कचरा और उत्सर्जन कम होता है। शुरुआत में लागत थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन बढ़ती ESG मांगों के चलते लंबे समय में वित्तीय लाभ और पर्यावरण के लिए इसके फायदे दिखेंगे।

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सर्कुलर डिज़ाइन से भारतीय ऑफिस इंटीरियर्स में बड़ा बदलाव

भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट मार्केट एक बड़े पर्यावरणीय सुधार की ओर बढ़ रहा है। सर्कुलर फिट-आउट रणनीतियों में ऑफिस इंटीरियर्स से होने वाले एम्बेडेड कार्बन उत्सर्जन (embodied carbon emissions) को 55% तक कम करने की क्षमता है। Savills India की एक रिपोर्ट बताती है कि इंटीरियर इंस्टॉलेशन सेक्टर के कार्बन फुटप्रिंट का एक बड़ा हिस्सा हैं। यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) और टेक फर्मों की वजह से यह मार्केट तेजी से फैल रहा है। दुनियाभर में इमारतों से होने वाले सालाना कार्बन उत्सर्जन में बढ़ते योगदान के चलते सस्टेनेबिलिटी (sustainability) का महत्व बढ़ता जा रहा है।

मॉड्यूलर और रियूज़ेबल मटेरियल से उत्सर्जन में कमी

"द सर्कुलर लीप: रीइमेजिनिंग इंडियाज़ ऑफिस फिट-आउट्स" (The Circular Leap: Reimagining India's Office Fit-Outs) नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मॉड्यूलर डिज़ाइन, रियूज़ेबल मटेरियल (reusable materials) का इस्तेमाल और पूरे लाइफसाइकिल पर केंद्रित योजना के ज़रिए प्रोजेक्ट-लेवल एम्बेडेड कार्बन उत्सर्जन में 25-55% तक की कमी लाई जा सकती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इंटीरियर फिट-आउट्स से होने वाला उत्सर्जन, बिल्डिंग के मुख्य कंस्ट्रक्शन से होने वाले उत्सर्जन के बराबर या उससे भी ज़्यादा हो सकता है।

व्यापक अपनाने में आने वाली बाधाओं का समाधान

सर्कुलर ऑफिस इंटीरियर्स को बड़े पैमाने पर अपनाने में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे सप्लाई चेन का बिखरा होना, मानकीकरण (standardization) की कमी और खरीद (procurement) पर दबाव। हालांकि, Savills India का मानना है कि एनवायरनमेंटल, सोशल और गवर्नेंस (ESG) फैक्टर्स पर बढ़ती जांच और बदलते वर्कस्पेस की ज़रूरतों के कारण इन तरीकों का इस्तेमाल बढ़ेगा। Savills India में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर, सुमित रक्षित (Sumit Rakshit) ने लाइफसाइकिल-लेड डिज़ाइन (lifecycle-led design) को अपनाने के रणनीतिक फायदे पर जोर दिया। सर्कुलर फिट-आउट्स में भले ही शुरुआत में कैपिटल एक्सपेंडिचर (10-15%) ज़्यादा हो, लेकिन अनुमान है कि 5 से 10 सालों में कम रिप्लेसमेंट कॉस्ट और लंबी एसेट लाइफ के ज़रिए यह निवेश वसूल हो जाएगा।

पॉलिसी और सहयोग से रास्ता होगा आसान

Savills India में रिसर्च एंड कंसल्टिंग के मैनेजिंग डायरेक्टर, अरविंद नंदन (Arvind Nandan) ने कहा कि भविष्य की वर्कप्लेस स्ट्रेटेजी में ऑफिस इंटीरियर्स की भूमिका और महत्वपूर्ण होगी। जो कंपनियां इन तरीकों को अपनाएंगी, वे बढ़ती ESG उम्मीदों को पूरा करने में बेहतर स्थिति में होंगी। सर्कुलर फिट-आउट्स को प्रभावी ढंग से स्केल करने के लिए ग्रीन प्रोक्योरमेंट पॉलिसी (green procurement policies) और स्पष्ट डिस्क्लोजर फ्रेमवर्क (disclosure frameworks) सहित मजबूत रेगुलेटरी सपोर्ट की ज़रूरत है। डेवलपर्स, किरायेदारों (tenants), ठेकेदारों (contractors) और सप्लायर्स के बीच ज़्यादा सहयोग भी ज़रूरी है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगले 5 से 7 सालों में ग्रेड-ए (Grade-A) और फ्लेक्सिबल ऑफिस स्पेस में सर्कुलर और लो-एम्बेडेड-कार्बन फिट-आउट्स आम हो जाएंगे। यह बदलाव मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन्स (multinational corporations) और GCCs द्वारा प्रेरित होगा जो ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों (sustainability goals) के अनुरूप स्पेस की तलाश में हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.