सप्लाई में तेज गिरावट, मार्केट का बदला रुख
2026 की पहली तिमाही (Q1 2026) में भारत के सात बड़े शहरों में नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई में पिछली तिमाही की तुलना में 36% की भारी कमी आई। यह पिछले चार तिमाहियों में सबसे निचला स्तर रहा। ग्लोबल सप्लाई चेन की दिक्कतें और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण डेवलपर्स की सावधानी ने इस स्थिति को और बिगाड़ा, जिससे ऑक्यूपायर्स (ऑफिस किराए पर लेने वालों) की जरूरत और उपलब्ध जगह के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो गया। सबसे ज्यादा असर हैदराबाद में देखा गया, जहां नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई 95% घटकर मात्र 0.3 मिलियन वर्ग फुट रह गई।
मांग मजबूत, वेकेंसी में लगातार कमी
हालांकि, दूसरी ओर ऑफिस लीजिंग (किराए पर लेने की मांग) मजबूत बनी रही और साल-दर-साल 20% बढ़कर करीब 21.5 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंच गई। इस बढ़ती मांग ने नई सप्लाई को पीछे छोड़ दिया, जिससे पूरे भारत में ऑफिस स्पेस की वेकेंसी रेट (खाली पड़े ऑफिस का प्रतिशत) पिछले तिमाही के 10.8% से घटकर 9.5% पर आ गई। यह लगातार ग्यारहवीं तिमाही है जब वेकेंसी रेट में गिरावट देखी गई है, जो मार्केट में कसावट का साफ संकेत है।
किराए में जोरदार उछाल
इस टाइट सप्लाई के चलते किराए में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। भारत भर में औसत किराया ₹100 प्रति वर्ग फुट प्रति माह के अहम पड़ाव को पार कर गया है। सबसे ज्यादा सालाना किराये में बढ़ोतरी हैदराबाद में 5.3% देखी गई, इसके बाद मुंबई में 4.4% और NCR में 3.3% की वृद्धि हुई। कुछ इलाकों में तो इससे भी तेज ग्रोथ देखने को मिली, जहां NCR और कोलकाता ने 15% सालाना किराये में बढ़ोतरी दर्ज की। बेंगलुरु और NCR ने भी पहली बार ₹100 प्रति वर्ग फुट का आंकड़ा पार किया। मुंबई अभी भी सबसे महंगा बाजार बना हुआ है, जहां औसत किराया ₹152.6 प्रति वर्ग फुट प्रति माह है।
GCCs और आर्थिक स्थिरता का सपोर्ट
ऑफिस की मांग के मुख्य कारणों में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का बड़ा योगदान है, जिन्होंने Q1 2026 में कुल लीजिंग एक्टिविटी का लगभग 53% हिस्सा, यानी 11.5 मिलियन वर्ग फुट जगह ली। IT-ITeS और BFSI सेक्टर भी प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, और AI-रेडी स्पेस की बढ़ती मांग के लिए एडवांस्ड डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। भारत की आर्थिक स्थिरता, जिसमें Q2 FY26 में 8.2% GDP ग्रोथ और 5.25% का रेपो रेट शामिल है, इस मजबूत मांग को सहारा दे रही है।
रिकॉर्ड निवेश, मगर जोखिम भी
इस सेक्टर में संस्थागत निवेश (institutional investment) में भी तेज उछाल आया, जो 72% साल-दर-साल बढ़कर रिकॉर्ड $5.1 बिलियन तक पहुंच गया। यह निवेश मुख्य रूप से घरेलू निवेशकों और REITs (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट) से आया। ऑफिस प्रॉपर्टीज इन निवेशों का मुख्य लक्ष्य रहीं, जो सेक्टर के भविष्य में मजबूत विश्वास को दर्शाता है। हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक अस्थिरता एक स्पष्ट जोखिम पेश करती है। ग्लोबल एनर्जी और शिपिंग लाइन्स में व्यवधानों के कारण निर्माण सामग्री की लागत बढ़ सकती है, जिससे प्रोजेक्ट में देरी और किराए पर दबाव आ सकता है।
भविष्य का अनुमान
इंडस्ट्री एनालिस्ट्स को उम्मीद है कि मकानमालिकों के पक्ष वाली स्थितियां जारी रहेंगी। वेकेंसी रेट के कम रहने और किराये की ग्रोथ में तेजी आने की उम्मीद है। GCCs और बदलती कंपनी रणनीतियों से प्रेरित मजबूत डिमांड पाइपलाइन, सीमित नई सप्लाई के साथ मिलकर, इस ऊपर की ओर रुझान के बने रहने का सुझाव देती है।
