भारत में ऑक्यूपाइड ऑफिस स्पेस बढ़कर **917.7 मिलियन स्क्वायर फीट** पर पहुंच गया है, जिसमें सालाना **7%** की ग्रोथ दर्ज की गई है। आईटी सेक्टर की सुस्ती के बावजूद फाइनेंस कंपनियों और ग्लोबल रिसर्च सेंटर्स की बढ़ती मांग से रियल एस्टेट मार्केट को मजबूती मिल रही है।
भारतीय कमर्शियल रियल एस्टेट मार्केट ने एक नया मुकाम हासिल कर लिया है। बीते एक साल में ही 58.3 मिलियन स्क्वायर फीट नई जगह जुड़ी है, जो यह दर्शाता है कि कंपनियां अब भी फिजिकल ऑफिस पर भरोसा जता रही हैं। यह सेक्टर, खासकर REITs के जरिए निवेश करने वालों के लिए काफी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
बदलता हुआ Tenant Mix और डिमांड
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ऑफिस स्पेस लेने वाली कंपनियों का प्रोफाइल बदल रहा है। कभी डिमांड की कमान पूरी तरह से आईटी (IT) सेक्टर के पास थी, लेकिन अब इसमें ठहराव देखा जा रहा है। इस कमी को BFSI (बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और इंश्योरेंस) और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स ने पूरा किया है। यह एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि डायवर्सिफाइड क्लाइंट्स होने से रेंटल इनकम की स्थिरता बढ़ती है और किसी एक सेक्टर में मंदी आने का रिस्क कम हो जाता है।
शहर-दर-शहर प्रदर्शन
बेंगलुरु अब भी 227.9 मिलियन स्क्वायर फीट के साथ सबसे बड़ा ऑफिस हब बना हुआ है। वहीं, हैदराबाद में 11% की जबरदस्त ग्रोथ देखने को मिली है, जो वहां बढ़ते बिजनेस इंटरेस्ट को दिखाती है। पुणे ने 100 मिलियन स्क्वायर फीट का आंकड़ा पार कर एक मैच्योर मार्केट के रूप में जगह बनाई है। दूसरी ओर, नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) में ग्रोथ की रफ्तार काफी सुस्त यानी 2% रही है, जो सप्लाई और डिमांड के बीच तालमेल की कमी की ओर इशारा करती है।
भविष्य के रिटर्न पर असर
ऑफिस स्पेस का विस्तार इकोनॉमी के लिए तो अच्छा है, लेकिन निवेशकों को रिस्क फैक्टर्स पर नजर रखनी चाहिए। हाई इंटरेस्ट रेट्स के कारण डेवलपर्स की कर्ज लेने की लागत बढ़ रही है। यदि निर्माण की गति नई लीजिंग से ज्यादा होती है, तो ओवरसप्लाई का खतरा बन सकता है, जिससे रेंट पर दबाव आने की आशंका है। आने वाले समय में रेंटल यील्ड और ऑक्यूपेंसी लेवल्स पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि यही REIT होल्डर्स को मिलने वाले डिविडेंड (Dividend) को तय करते हैं।
