भारत के ऑफिस रियल एस्टेट मार्केट में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का दबदबा कायम है। 2026 की पहली छमाही में **4.26 करोड़** वर्ग फुट जगह लीज़ पर दी गई, जिसमें GCCs की हिस्सेदारी करीब आधी रही। इस जबरदस्त डिमांड के चलते किराए में **9%** की बढ़ोतरी हुई है और औसत किराया **₹96** प्रति वर्ग फुट तक पहुंच गया है।
GCCs की वजह से ऑफिस मार्केट में बूम
2026 की पहली छमाही में भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट मार्केट ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की वजह से एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। इन सेंटर्स ने 1.92 करोड़ वर्ग फुट जगह लीज़ पर ली, जो पूरे देश के टॉप 7 शहरों में कुल 4.26 करोड़ वर्ग फुट लीजिंग का 45% रहा। यह दिखाता है कि मल्टीनेशनल कंपनियां इंडिया में R&D, AI और साइबर सिक्योरिटी जैसे कामों के लिए अपने ऑपरेशन्स बढ़ा रही हैं।
सप्लाई और किराए पर असर
GCCs की इस भारी डिमांड ने मार्केट का समीकरण पूरी तरह बदल दिया है। जहां एक तरफ डिमांड बढ़ी, वहीं दूसरी तरफ डेवलपर्स ने नए प्रोजेक्ट्स लाने में सावधानी बरती। नतीजतन, नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई में 10% की गिरावट आई और यह कुल 2.215 करोड़ वर्ग फुट रहा। बढ़ती डिमांड और घटती सप्लाई के इस कॉम्बिनेशन ने मार्केट को टाइट कर दिया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि टॉप 7 शहरों में ऑफिस स्पेस की वैकंसी 16.3% से घटकर 15% पर आ गई। इस बेहतर बैलेंस के कारण, प्रॉपर्टी मालिकों ने औसत किराए में 9% का इजाफा किया, जो अब ₹96 प्रति वर्ग फुट हो गया है।
दक्षिणी शहरों में सबसे ज्यादा ग्रोथ
इस ग्रोथ का सबसे ज्यादा फायदा दक्षिणी शहरों को हुआ है। बेंगलुरु इस मामले में सबसे आगे है, जहां 1.08 करोड़ वर्ग फुट की ऑफिस लीजिंग हुई, और इसमें GCCs की हिस्सेदारी 70% रही। हैदराबाद और चेन्नई में भी GCCs का योगदान क्रमशः 48% और 55% रहा। यानी, अकेले बेंगलुरु और हैदराबाद ने साल की पहली छमाही में भारत की कुल ऑफिस लीजिंग का लगभग 50% हिस्सा कवर किया। वहीं, नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) और मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन जैसे इलाकों में पिछले साल की तुलना में नेट एब्जॉर्प्शन में कमी देखी गई।
अलग-अलग सेक्टर्स की बढ़ी डिमांड
GCCs के अलावा, अब दूसरे सेक्टर्स से भी ऑफिस स्पेस की डिमांड बढ़ रही है। IT/ITeS कंपनियों ने 26% मार्केट शेयर हासिल किया, जबकि फ्लेक्सिबल वर्कस्पेस ऑपरेटर्स 25% के साथ दूसरे नंबर पर रहे। बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज, मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल फर्म्स ने भी अपने ऑफिस फुटप्रिंट्स का विस्तार किया है। यह डाइवर्सिफिकेशन किसी एक सेक्टर पर निर्भरता को कम करता है और कमर्शियल रियल एस्टेट के लिए एक मजबूत डिमांड बेस का संकेत देता है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
रियल एस्टेट में निवेश करने वालों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए प्रोजेक्ट्स की सप्लाई और एक्चुअल लीजिंग एक्टिविटी के बीच संतुलन कैसे बना रहता है। फिलहाल, बढ़ते किराए और घटती वैकंसी प्रॉपर्टी मालिकों और REITs के लिए अच्छी खबर है। लेकिन लंबी अवधि में इसका फायदा तभी होगा जब डेवलपर्स आने वाली तिमाहियों में मार्केट में और सप्लाई लाएंगे और लीजिंग का यह मोमेंटम जारी रहेगा।
