India Office Market: रिकॉर्ड लीजिंग, पर REITs की क्षमता अधूरी

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Office Market: रिकॉर्ड लीजिंग, पर REITs की क्षमता अधूरी
Overview

साल 2025 में भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर ने ऑफिस लीजिंग के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस ज़बरदस्त ग्रोथ की मुख्य वजह ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का बढ़ता दबदबा रहा, जो अब 40% से ज़्यादा की डिमांड पैदा कर रहे हैं। हालांकि, इस बूम के बावजूद, भारत का रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REIT) सेगमेंट ग्लोबल बेंचमार्क के मुकाबले काफी पीछे है, जो एक बड़ी चिंता का विषय है।

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GCCs के दम पर भारत के ऑफिस मार्केट में रिकॉर्डतोड़ लीजिंग

साल 2025 भारतीय रियल एस्टेट के लिए एक ऐतिहासिक साल साबित हुआ है। देश के टॉप सात शहरों में ग्रॉस ऑफिस लीजिंग का आंकड़ा करीब 8.05 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। इस ग्रोथ को रफ़्तार देने में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का सबसे बड़ा हाथ रहा, जिन्होंने अकेले 3.25 करोड़ वर्ग फुट से ज़्यादा की लीजिंग की, जो कुल लीजिंग का 40% से ज़्यादा है। यह दिखाता है कि कैसे GCCs अब भारत के ऑफिस स्पेस की डिमांड तय कर रहे हैं। एक दशक पहले जहां ये डिमांड मुख्य रूप से डोमेस्टिक आईटी सर्विसेज कंपनियों से आती थी, वहीं अब GCCs इस बाज़ार का चेहरा बदल चुके हैं। भारत में GCCs का मार्केट साइज़ 2019 में जहां $30 अरब था, वहीं 2024 में यह बढ़कर $64 अरब हो गया है और 2030 तक इसके $105–110 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है, जो 10% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा।

GCCs का रणनीतिक विकास और नए शहरों में विस्तार

GCCs अब सिर्फ सपोर्ट फंक्शन्स तक सीमित नहीं रहे, बल्कि ग्लोबल डिसीजन-मेकिंग का अहम हिस्सा बन गए हैं। इसी वजह से वे प्रीमियम 'ग्रेड ए' ऑफिस स्पेस और लंबी अवधि के लीज की डिमांड बढ़ा रहे हैं। यह सब सरकारी नीतियों, कॉर्पोरेट स्ट्रैटेजी और कैपिटल मार्केट में बढ़ते भरोसे के दम पर हो रहा है। बेंगलुरु अभी भी इस दौड़ में सबसे आगे है, जहां 875 से ज़्यादा GCCs हैं और 2025 में देश की कुल GCC लीजिंग का लगभग एक तिहाई हिस्सा बेंगलुरु से आया। वहीं, दूसरी ओर, बड़े शहरों में बढ़ती लागत और भीड़भाड़ के कारण कंपनियां अब जयपुर, इंदौर, कोच्चि, कोयम्बटूर और सूरत जैसे टियर-2 शहरों की ओर भी रुख कर रही हैं। ये शहर कम ऑपरेशनल कॉस्ट और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। इसके अलावा, भारत का एकमात्र इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर, GIFT City, भी GCCs के लिए एक महत्वपूर्ण डेस्टिनेशन के तौर पर उभर रहा है, जहां वे ग्लोबल इनोवेशन सेंटर्स स्थापित कर रहे हैं। गुजरात की GCC पॉलिसी 2025-30 इसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

REITs मार्केट का डिस्कनेक्ट: मजबूत ग्रोथ के बावजूद कम पैठ

ऑफ़िस रियल एस्टेट में इतनी ज़बरदस्त डिमांड के बावजूद, भारत का रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REIT) सेगमेंट अभी भी काफी अंडर-डेवलप्ड है। देश में अभी पांच लिस्टेड REITs हैं, जिनकी कुल मार्केट कैप लगभग $18 अरब है। इसका मतलब है कि भारत के इंस्टीट्यूशनल रियल एस्टेट का केवल 20% हिस्सा ही अभी सिक्योरिटाइज्ड है। यह आंकड़ा अमेरिका (लगभग 96%) या सिंगापुर (लगभग 55-67%) जैसे विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। 2019 में पहली लिस्टिंग के बाद से इस मार्केट में काफी ग्रोथ हुई है और Q2 FY26 तक यह अनुमानित 1.6 ट्रिलियन रुपये (लगभग $19 अरब) तक पहुंच गया है, लेकिन यह अभी भी अपनी पूरी क्षमता का एक छोटा सा हिस्सा है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2030 तक REIT पेनिट्रेशन 25-30% तक पहुंच सकता है, जिसमें डेटा सेंटर्स, लॉजिस्टिक्स पार्क्स और रिटेल मॉल्स जैसे अल्टरनेटिव एसेट्स का भी योगदान होगा। सितंबर 2025 में SEBI द्वारा REITs को इक्विटी इंस्ट्रूमेंट्स के तौर पर री-डेजिग्नेट करने जैसे नियमों में बदलाव ने लिक्विडिटी और इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स की पहुंच बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन, मज़बूत ऑक्यूपायर डिमांड और REITs के ज़रिए सीमित कैपिटल मार्केट एक्सेस के बीच यह अंतर एक बड़ी एनालिटिकल चुनौती पेश करता है।

पॉलिसी सपोर्ट और मैक्रोइकॉनॉमिक रेसिलिएंस

सरकारी नीतियां इस ग्रोथ स्टोरी को लगातार सपोर्ट कर रही हैं। यूनियन बजट 2026 में अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के लिए स्किलिंग और REITs के लिए टैक्स स्टेबिलिटी पर ज़ोर दिया गया। बजट में पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर और अर्बन इंफ्रा डेवलपमेंट पर फोकस, मेट्रो शहरों के बाहर ग्रोथ हब्स को बढ़ावा देने का संकेत देता है। FY2024-25 में $81.04 अरब का फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) इनफ्लो, जो पिछले साल की तुलना में 14% ज़्यादा है, यह दिखाता है कि भारत एक आकर्षक इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन बना हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत का GCC-led ऑफिस बूम लॉन्ग-टर्म कॉर्पोरेट रीस्ट्रक्चरिंग और टैलेंट स्ट्रैटेजीज़ पर आधारित है, न कि केवल मार्केट लिक्विडिटी पर, जो इसे एक स्ट्रक्चरल ग्रोथ बनाता है। भारत की रिलेटिव मैक्रो स्टेबिलिटी और मज़बूत डोमेस्टिक डिमांड, ग्लोबल इकोनॉमिक अनिश्चितताओं और बढ़ती ब्याज दरों के प्रभाव को कम करती है, जिन्होंने दुनिया भर के रियल एस्टेट मार्केट्स को प्रभावित किया है।

आउटलुक: 'बैक ऑफिस' से 'ब्रेन सेंटर' की ओर भारत

भारत अब ग्लोबल एंटरप्राइजेज के लिए सिर्फ 'बैक ऑफिस' नहीं, बल्कि 'ब्रेन सेंटर' के तौर पर अपनी भूमिका निभा रहा है। GCCs की अनुमानित ग्रोथ और ऑफिस डिमांड में स्ट्रक्चरल बदलाव, कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर के निरंतर विस्तार का संकेत दे रहे हैं। REITs का अल्टरनेटिव एसेट्स में डायवर्सिफिकेशन, इन्वेस्टमेंट के नए अवसर खोलेगा। एनालिस्ट्स का मानना है कि लॉन्ग-टर्म स्ट्रक्चरल शिफ्ट को लेकर उनका सेंटिमेंट पॉजिटिव है, हालांकि REIT मार्केट के विकास की रफ़्तार कैपिटल मार्केट की पूरी क्षमता को अनलॉक करने में महत्वपूर्ण होगी। 2030 तक, GCCs इनोवेशन, टैलेंट और स्ट्रैटेजिक कॉर्पोरेट इंटीग्रेशन के ज़रिए भारत की ग्लोबल इकोनॉमिक पोजिशन को आकार देने के लिए तैयार हैं।

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