भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट मार्केट में इस साल की पहली तीन तिमाहियों (9M 2026) में कुल **66.7 मिलियन स्क्वायर फीट** ऑफिस स्पेस लीज पर लिया गया है। डिमांड में ठहराव के बावजूद, मार्केट में बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव दिख रहा है, जहां ट्रेडिशनल IT सर्विसेज की जगह अब ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) ने ले ली है और ये कुल ट्रांजैक्शंस का **41%** हिस्सा बन चुके हैं।
भारतीय ऑफिस लीजिंग मार्केट ने साल 2026 के पहले नौ महीनों में काफी संतुलित प्रदर्शन दिखाया है। कुल 66.7 मिलियन स्क्वायर फीट का वॉल्यूम पिछले साल की समान अवधि के बराबर है, जो यह दर्शाता है कि मैक्रोइकोनॉमिक चुनौतियों के बावजूद शहरों में ऑफिस स्पेस की मांग बरकरार है।
ऑक्यूपायर डिमांड में बदलाव
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी ट्रेंड मांग के स्वरूप में आ रहा बदलाव है। मार्केट अब ट्रेडिशनल IT/ITeS और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के बीच एक स्पष्ट अंतर देख रहा है। जहां थर्ड-पार्टी IT सर्विसेज की लीजिंग में साल-दर-साल 36% की गिरावट आई है, वहीं इसकी भरपाई GCCs के आक्रामक विस्तार ने की है। पिछले साल के 37% की तुलना में अब GCCs का हिस्सा बढ़कर 41% तक पहुंच गया है, जो साबित करता है कि विदेशी कंपनियां भारत में हाई-वैल्यू हब बनाने पर दांव लगा रही हैं।
शहरों का प्रदर्शन: उतार और चढ़ाव
क्षेत्रीय आधार पर प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। हैदराबाद एक बड़े ग्रोथ पॉकेट के रूप में उभरा है, जहां लीजिंग वॉल्यूम में 50% का उछाल देखा गया है। इसके विपरीत, बेंगलुरु में 26% की गिरावट दर्ज की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि बेंगलुरु में यह कमी पिछले सालों के हाई बेस के कारण है, न कि मार्केट के प्रति कम होती दिलचस्पी की वजह से। वहीं, मुंबई और पुणे जैसे शहरों ने भी मार्केट को संभालने में अपना योगदान दिया है।
रेंटल ट्रेंड्स और रिस्क फैक्टर्स
लीज़िंग वॉल्यूम में भले ही तेजी न आई हो, लेकिन मकान मालिकों का रेंटल मार्केट पर कंट्रोल अभी भी मजबूत बना हुआ है। रेंटल ग्रोथ लगातार जारी है, जिसे फ्लेक्स-स्पेस ऑपरेटर्स और घरेलू कंपनियों से मिल रही मांग का साथ मिल रहा है। हालांकि, निवेशकों को तकनीकी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि ग्लोबल लेवल पर टेक खर्च में कटौती होती है, तो प्रीमियम ऑफिस स्पेस के एब्जॉर्प्शन रेट पर असर पड़ सकता है। साथ ही, प्राइम लोकेशन्स पर ग्रीन-सर्टिफाइड ऑफिस स्पेस की सीमित सप्लाई भी भविष्य में एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
