India Office Leasing: APAC में भारत का दबदबा, H1 2026 में 70% हिस्सेदारी!

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Office Leasing: APAC में भारत का दबदबा, H1 2026 में 70% हिस्सेदारी!

साल 2026 की पहली छमाही में एशिया-प्रशांत (APAC) क्षेत्र के प्रमुख बाजारों में हुए कुल ऑफिस लीजिंग वॉल्यूम में भारत की हिस्सेदारी 70% से अधिक रही। यह रुझान ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के विस्तार से प्रेरित होकर, भारत के वैश्विक व्यापार संचालन केंद्र के रूप में बढ़ते महत्व को दर्शाता है। मांग मजबूत बनी हुई है, लेकिन निवेशकों को निर्माण लागत और वैश्विक आर्थिक बदलावों के लंबी अवधि के रेंटल यील्ड पर पड़ने वाले प्रभाव पर नजर रखनी चाहिए।

साल 2026 की पहली छमाही में भारत के रियल एस्टेट मार्केट ने एशिया-प्रशांत (APAC) क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, देश ने 11 प्रमुख बाजारों में कुल ऑफिस लीजिंग वॉल्यूम का 70% से अधिक हिस्सा हासिल किया, जो वैश्विक कंपनियों के लिए इसके आकर्षण को उजागर करता है। APAC क्षेत्र में कुल लीजिंग 4.6 मिलियन वर्ग मीटर तक पहुँच गई, जो पिछले साल की तुलना में 3% अधिक है। इस वृद्धि में मुख्य रूप से भारत, चीन और जापान का योगदान रहा, जिन्होंने मिलकर कुल गतिविधि का 95% से अधिक हिस्सा हासिल किया।

GCCs का बढ़ता प्रभाव

भारत में इस भारी मांग का एक बड़ा कारण ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का तेजी से विस्तार है। ये सेंटर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए टेक्नोलॉजी और बिजनेस ऑपरेशन्स को संभालते हैं और कुशल प्रतिभा की उपलब्धता व अन्य क्षेत्रों की तुलना में महत्वपूर्ण लागत लाभ के कारण भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इन सेंटरों के बढ़ने के साथ ही, प्रीमियम 'ग्रेड ए' ऑफिस स्पेस की मांग लगातार बढ़ रही है।

सप्लाई में कमी, कीमतों में उछाल की उम्मीद?

जहां एक ओर मांग बढ़ रही है, वहीं सप्लाई में कमी देखी जा रही है। ट्रैक किए गए APAC बाजारों में नए ऑफिस सप्लाई में साल-दर-साल 37% की गिरावट आई और यह 3 मिलियन वर्ग मीटर तक सीमित रह गई। भारत और चीन ने इस नए स्पेस का 80% से अधिक योगदान दिया। निवेशकों और डेवलपर्स के लिए, सप्लाई में यह कमी एक महत्वपूर्ण कारक है। बढ़ती मांग की तुलना में उच्च-गुणवत्ता वाले ऑफिस स्पेस की कमी, रेंटल ग्रोथ को बढ़ावा देती है और संपत्ति के मूल्यों को स्थिर रखती है। इसी कमी के कारण प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों में ऑक्यूपेंसी लेवल बना हुआ है।

आगे की चुनौतियां

सकारात्मक रुझानों के बावजूद, निवेशकों को संभावित चुनौतियों से सावधान रहना चाहिए। भू-राजनीतिक अनिश्चितता और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तनाव वैश्विक व्यापार विस्तार की गति को प्रभावित कर सकते हैं, जिसका सीधा असर ऑफिस स्पेस की जरूरतों पर पड़ता है। इसके अलावा, लगातार महंगाई और स्टील व सीमेंट जैसी कच्ची सामग्रियों की बढ़ती कीमतें निर्माण लागत को बढ़ा सकती हैं। यदि डेवलपर्स इन बढ़ी हुई लागतों को किराएदारों से वसूल नहीं कर पाते हैं, तो इससे उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है।

हालांकि ऑफिस सेक्टर निवेश के लिए एक पसंदीदा विकल्प बना हुआ है, लेकिन व्यापक आर्थिक माहौल को देखते हुए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये लागतें प्रोजेक्ट डिलीवरी टाइमलाइन को कैसे प्रभावित करती हैं। बाजार यह निगरानी करना जारी रखेगा कि क्या बढ़ती लागतों के बीच वर्तमान लीजिंग की गति को बनाए रखा जा सकता है। भविष्य में, इस लीजिंग ट्रेंड की स्थिरता GCCs के निरंतर विस्तार और डेवलपर्स की प्रोजेक्ट बजट प्रबंधन क्षमता पर निर्भर करेगी। निवेशकों को भविष्य के लीजिंग वॉल्यूम और कॉर्पोरेट विस्तार योजनाओं में किसी भी बदलाव पर नजर रखनी चाहिए जो इन मांग की मूल बातों को बदल सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.