भारत के हाउसिंग मार्केट में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। साल 2026 के मध्य तक, बिना बिके घरों का स्टॉक **4%** बढ़कर **5,25,695** यूनिट्स पर पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह प्रीमियम और लग्जरी सेगमेंट में लॉन्च हुए प्रोजेक्ट्स की अधिक संख्या है। जहां **₹1 करोड़** से कम कीमत वाले घरों की डिमांड अभी भी मजबूत है, वहीं महंगे घरों के बाजार में डिमांड और सप्लाई का बड़ा गैप नजर आ रहा है।
खरीदारों का बदलता मिजाज
भारतीय रियल एस्टेट मार्केट में घरों की बिक्री की रफ्तार में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। जहां किफायती (affordable) और मिड-रेंज घरों की डिमांड लगातार बनी हुई है, वहीं प्रीमियम और लग्जरी सेगमेंट में बिना बिके प्रॉपर्टीज का ढेर लगता जा रहा है। साल 2026 के मध्य तक के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के आठ बड़े शहरों में बिना बिके रेसिडेंशियल यूनिट्स की कुल संख्या 4% बढ़कर 5,25,695 यूनिट्स हो गई है।
आम आदमी के घरों की डिमांड मजबूत
मार्केट ट्रेंड्स से साफ है कि खरीदार कम कीमत वाले घरों में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ₹50 लाख से कम कीमत वाले घरों का स्टॉक 7% घटकर 1,71,363 यूनिट्स रह गया है। वहीं, ₹50 लाख से ₹1 करोड़ के बीच वाले सेगमेंट में भी 3% की गिरावट आई है और यह 1,34,841 यूनिट्स पर आ गया है। यह दिखाता है कि आम आदमी के लिए घर खरीदना अभी भी प्राथमिकता है और इन सेगमेंट्स में नई सप्लाई कम होने से डिमांड बनी हुई है।
लग्जरी सेगमेंट में बढ़ती मुश्किलें
इसके विपरीत, लग्जरी हाउसिंग सेक्टर सप्लाई और डिमांड के बड़े मिसमैच का सामना कर रहा है। पिछले कुछ सालों में डेवलपर्स ने हाई-एंड प्रोजेक्ट्स की खूब लॉन्चिंग की, लेकिन बिक्री उतनी रफ्तार से नहीं हो पाई। ₹2 करोड़ से ₹5 करोड़ के प्राइस सेगमेंट में बिना बिके घरों का स्टॉक 43% बढ़कर 65,671 यूनिट्स तक पहुंच गया। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि ₹20 करोड़ से ₹50 करोड़ की अल्ट्रा-लग्जरी कैटेगरी में बिना बिके स्टॉक में 52% का उछाल आया है।
इस स्थिति का असर 'क्वार्टर टू सेल' (QTS) मेट्रिक पर भी पड़ा है, जो बताता है कि मौजूदा स्टॉक को बिकने में कितना समय लगेगा। साल 2026 की पहली छमाही में यह अवधि बढ़कर 6.0 क्वार्टर हो गई है, जो 2025 के अंत में 5.8 क्वार्टर थी। शहरों में भी स्थिति अलग-अलग है। अहमदाबाद और NCR में स्टॉक क्लियर करने में सबसे ज्यादा समय लग रहा है, जबकि पुणे और चेन्नई बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
डेवलपर्स और निवेशकों के लिए क्या है मायने?
एक अच्छी बात यह है कि बिना बिके इन्वेंट्री की उम्र कम हुई है, जो 14.3 क्वार्टर से घटकर 13.5 क्वार्टर रह गई है। इसका मतलब है कि खरीदार अब शुरुआती स्टेज वाले प्रोजेक्ट्स की जगह लगभग तैयार हो चुके घरों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। हालांकि, लग्जरी इन्वेंट्री का बढ़ना उन डेवलपर्स के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिनका फोकस इन सेगमेंट्स पर ज्यादा है।
अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो डेवलपर्स पर नए हाई-एंड प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग रोकने या अपनी बैलेंस शीट को ठीक करने के लिए आकर्षक प्राइसिंग और पेमेंट प्लान पेश करने का दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों के लिए, बड़ी रियल एस्टेट फर्मों की बिक्री की रफ्तार पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। जिन कंपनियों ने प्री-सेल्स के बिना लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा दांव लगाया है, उन्हें नकदी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। डेवलपर्स की अपने प्रोडक्ट मिक्स को बेहतर प्रदर्शन करने वाले अफोर्डेबल और मिड-रेंज कैटेगरी की ओर मोड़ने की क्षमता आने वाली तिमाही अपडेट्स में एक महत्वपूर्ण फैक्टर साबित होगी।
