बाजार में स्थिरता की उम्मीद 2028 तक
CBRE की इंडिया रेजिडेंशियल मार्केट आउटलुक 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी मार्केट 2026 और 2028 के बीच एफोर्डेबिलिटी के मामले में स्थिर हो सकता है। यह उम्मीद इसलिए है क्योंकि 2021 के बाद पहली बार घरों की कीमतें जितनी तेजी से बढ़ी हैं, उससे कहीं ज्यादा तेजी से लोगों की आय बढ़ने की संभावना है। इससे बड़े शहरों में घर खरीदारों पर फाइनेंशियल बोझ कम होगा। EMI-to-income रेश्यो में गिरावट का ट्रेंड दिखेगा, जो 2021 से 2024 के दौरान बढ़ा था। इसके पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ब्याज दरें बढ़ाना और घरों की कीमतों में तेजी मुख्य कारण थे। अब उम्मीद है कि ब्याज दरों में कमी, कीमतों में नरमी और बढ़ी हुई डिस्पोजेबल इनकम एफोर्डेबिलिटी को बेहतर बनाने में मदद करेगी।
प्रीमियम सेगमेंट में जोरदार उछाल
प्रीमियम और लक्जरी हाउसिंग मार्केट इस वक्त काफी बुलिश (bullish) दिख रहा है और यह मौजूदा रियल एस्टेट एक्टिविटी का एक बड़ा हिस्सा बन गया है। 2025 में, घरों की नई लॉन्चिंग और बिक्री दोनों 2,70,000 यूनिट्स से ऊपर रहीं। हाई-एंड कैटेगरी ने कुल बिक्री का लगभग 27% हिस्सा कवर किया, जो पहली बार मिड-मार्केट सेगमेंट से ज़्यादा है। इन प्रीमियम इलाकों में बिक्री में 30% सालाना की ग्रोथ देखी गई। नई सप्लाई भी 38% बढ़कर लगभग 52,000 लक्जरी यूनिट्स तक पहुंच गई। कुल बिक्री वॉल्यूम में 8% की गिरावट के बावजूद, कुल बिक्री मूल्य में लगभग 15% का इजाफा हुआ है। यह हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNI) की बढ़ती संपत्ति के सहारे, महंगी और बेहतर क्वालिटी वाले घरों की ओर स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है।
अफॉर्डेबल हाउसिंग के सामने लगातार चुनौतियाँ
वहीं, ₹45 लाख से कम कीमत वाले अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट को अभी भी बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कंस्ट्रक्शन मैटेरियल की बढ़ी हुई लागत और सरकारी सपोर्ट में कमी इस सेक्टर पर भारी पड़ रही है, जिससे ग्रोथ धीमी हो गई है और मार्केट शेयर भी कम हुआ है। CBRE की रिपोर्ट में पॉलिसी एडजस्टमेंट की ज़रूरत पर जोर दिया गया है। इसमें प्रॉपर्टी की कीमतों और साइज की लिमिट में बदलाव, और बिल्डर्स व खरीदारों के लिए सपोर्ट को फिर से शुरू करने जैसे सुझाव शामिल हैं। ऐसे कदम इस सेगमेंट को प्री-पेंडमिक लेवल के 25-30% मार्केट शेयर को वापस पाने में मदद कर सकते हैं और सालाना लगभग 60,000 नए घर बनने की उम्मीद है। एनालिस्ट्स का कहना है कि अफोर्डेबल हाउसिंग पर फोकस करने वाले डेवलपर्स को प्रीमियम मार्केट के मुकाबले कम प्रॉफिट मार्जिन और धीमी बिक्री से जूझना पड़ रहा है।
आय के हिसाब से बंटा बाजार
2026 से 2028 के बीच एफोर्डेबिलिटी में आने वाली स्थिरता किसी एक वर्ग के लिए नहीं है, बल्कि यह साफ तौर पर आय और संपत्ति के हिसाब से बढ़ते बाजार के विभाजन को दिखाती है। करीब ₹40 लाख सालाना कमाने वाले परिवार ₹1.25–2 करोड़ के घरों को ज़्यादा आसानी से खरीद पाएंगे। ₹75 लाख कमाने वाले लोग 3BHK घर खरीद पाने की स्थिति में आ सकते हैं। वहीं, ₹1 करोड़ कमाने वाले लोगों के लिए प्रीमियम हाउसिंग के EMI पेमेंट कम हो सकते हैं। लेकिन यह कुछ लोगों के लिए धीमी सुधार की कहानी है, वहीं अफोर्डेबल सेगमेंट की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। पिछला डेटा बताता है कि आय में कीमतों से तेज़ ग्रोथ से एफोर्डेबिलिटी सुधर सकती है, लेकिन स्थायी सकारात्मक बदलाव, खासकर निम्न-आय वर्ग के लिए, लगातार सपोर्ट की मांग करते हैं। भारत की अनुमानित GDP ग्रोथ एक पॉजिटिव आर्थिक बैकड्रॉप देती है, लेकिन विदेश में आर्थिक अनिश्चितताएं और महंगाई अभी भी मार्केट कॉन्फिडेंस और सभी सेगमेंट्स में इन्वेस्टमेंट को प्रभावित कर सकती हैं।