भारत का हॉस्पिटैलिटी सेक्टर बड़े बदलाव की ओर है। 2035 तक **2,10,000** नए कमरों को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें प्रीमियम और लग्जरी सेगमेंट की **67%** हिस्सेदारी होगी।
भारतीय हॉस्पिटैलिटी सेक्टर अब एक नए दौर में है, जहां डेवलपर्स का ध्यान अब बड़े शहरों से हटकर प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स की ओर शिफ्ट हो रहा है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, अगले दशक में 90,000 से 2,10,000 नए होटल रूम्स की जरूरत होगी। इस विस्तार के लिए करीब 83.1 मिलियन स्क्वायर फीट जगह की आवश्यकता होगी।
लेजर और स्पिरिचुअल हब पर फोकस
अब कंपनियां बड़े मेट्रो शहरों के बजाय लेजर और स्पिरिचुअल टूरिज्म हब को प्राथमिकता दे रही हैं। बेहतर कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर के चलते मैसूरु, कुमारकोम और बारापानी जैसे शहरों में मांग बढ़ी है। वहीं, वाराणसी, तिरुपति, ऋषिकेश और पुरी जैसे धार्मिक स्थलों पर भी डेवलपर्स जमकर पैसा लगा रहे हैं।
इन्वेस्टमेंट और परफॉरमेंस के आंकड़े
साल 2024 से 2026 की पहली छमाही के बीच इस सेक्टर में $905 मिलियन (लगभग) का निवेश हुआ है। ऑपरेशनल फ्रंट पर भी नतीजे उत्साहजनक हैं। साल 2025 में होटलों की ऑक्यूपेंसी रेट 64% रही। वहीं, रिवेन्यू पर अवेलेबल रूम (RevPAR) में 11% की ग्रोथ देखी गई, जो कि बढ़कर ₹5,500 के स्तर पर पहुंच गया है।
क्या हैं निवेशकों के लिए रिस्क?
ग्रोथ की उम्मीदों के बीच निवेशकों को कुछ सावधानियां भी बरतनी होंगी। लग्जरी होटल्स में शुरुआत में जमीन और कंस्ट्रक्शन पर भारी खर्चा होता है। अगर डिमांड में गिरावट आती है, तो फिक्स्ड ऑपरेटिंग कॉस्ट मुनाफे पर दबाव डाल सकती है। इसके अलावा, लोकप्रिय डेस्टिनेशंस पर ज्यादा सप्लाई होने से भविष्य में कीमतों पर दबाव (Pricing Power) कम होने का रिस्क भी बना रहता है।
