साल 2026 की तीसरी तिमाही में भारत के सात बड़े शहरों में घरों की बिक्री **76,181** यूनिट्स तक पहुंच गई है, जो पिछली तिमाही के मुकाबले **12%** ज्यादा है। इस ग्रोथ की सबसे बड़ी वजह प्रीमियम घरों की मांग है, जबकि **₹1 करोड़** से कम कीमत वाले घरों की बिक्री में **23%** की गिरावट दर्ज की गई है।
भारत के रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी मार्केट में इस साल की तीसरी तिमाही के दौरान ग्रोथ का एक दिलचस्प पैटर्न देखने को मिला है। पिछले नौ महीनों की बात करें, तो कुल बिक्री 2,14,562 यूनिट्स रही है, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 6% अधिक है। हालांकि, ये आंकड़े ऊपरी तौर पर शानदार दिख रहे हैं, लेकिन अंदरूनी डेटा बताता है कि मार्केट के अलग-अलग सेगमेंट में भारी अंतर पैदा हो गया है।
प्रीमियम सेगमेंट में बहार
बाजार की यह तेजी पूरी तरह से प्रीमियम और लग्जरी कैटेगरी के दम पर है। ₹1 करोड़ से ऊपर के घरों की हिस्सेदारी अब कुल बिक्री में 72% हो गई है, जो पिछले साल 62% थी। इसमें भी ₹1.5 करोड़ से ₹3 करोड़ वाले घरों का सेगमेंट सबसे तेजी से आगे बढ़ा है, जिसमें साल-दर-साल आधार पर 54% की उछाल दर्ज की गई है। बिल्डर्स अब अपने प्रोजेक्ट्स में महंगे घरों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं क्योंकि इनमें प्रॉफिट मार्जिन बेहतर है।
आम आदमी के लिए बढ़ रही मुश्किल
एक तरफ लग्जरी घरों की चमक बरकरार है, तो दूसरी तरफ मिडिल क्लास के लिए घर खरीदना कठिन होता जा रहा है। ₹1 करोड़ से कम कीमत वाले घरों की बिक्री में 23% की गिरावट आई है। इसकी मुख्य वजह है होम लोन की बढ़ती लागत।
अक्टूबर 2026 तक रेपो रेट 5.5% पर बना हुआ है, जिससे ईएमआई (EMI) का बोझ काफी बढ़ गया है। इसका सबसे बुरा असर फर्स्ट-टाइम बायर्स और उन परिवारों पर पड़ रहा है, जो बजट में घर तलाश रहे हैं।
निवेशकों के लिए रिस्क और आउटलुक
निवेशकों को अब सतर्क रहने की जरूरत है। अगर प्रीमियम सेगमेंट में बहुत ज्यादा नए प्रोजेक्ट्स आते रहे, तो आने वाले वक्त में इन्वेंट्री सरप्लस (Inventory Surplus) की समस्या हो सकती है। अगर डेवलपर्स का फोकस पूरी तरह लग्जरी पर बना रहता है और वॉल्यूम कम होता है, तो कंपनियों के रेवेन्यू पर असर पड़ सकता है। निवेशकों की नजर अब रियल एस्टेट कंपनियों के इन्वेंट्री टर्नओवर रेशियो और महंगे घरों की डिमांड की सस्टेनेबिलिटी पर होनी चाहिए।
